Wednesday, 29 March 2017

लबों पर आज मेरे फिर

लबों पर आज मेरे फिर उसी का नाम आया है,
लिखी है "जिन्दगी" उसने यही पैगाम आया है|

बहाने हैं रुलाने के हमारे पास तो ढेरों,
मनाने क्युँ नहीं आया यही इल्जाम आया है|

निभाती वो गयी रिश्ते सभी रिश्ते निभाने को,
लिफाफा सादगी का फिर लिए अंजाम आया है|

पुरानी याद के पन्नें किताबों में छिपे बैठे,
इशारों ही इशारों में इशारा काम आया है|

नई दुनिया बसा ली तुम थमी थी डोर रिश्तों की,
निकलते आँख से आँसू सही अंजाम आया है|

न पूछो तुम भला भी कुछ वफायें चीखकर कहती,
दुआवों ही दुआवों में हिज़रत सलाम आया है|

बचा लो तुम मुहब्बत को नहीं तो ब्याह जायेगी,
पिटारे में जहर भरकर "अतुल" के नाम आया है||
                                       ✍©अतुल कुमार यादव

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