सोच रहा हूँ बैठे बैठे,
ये कैसा गज़ब तमाशा है।
रहते कैसे लोग यहां पर,
किसी से न जिनका नाता है।।
पल दो पल में कोई कैसे,
इन रिश्तों में बध जाता है।
मौन, मौन की भाषा सुन कर,
दिल की तह तक को भाता है।।
इक अन्जाना सा वो रिश्ता,
फिर इन गीतों को गाता है।
संकल्पों की भाषा बनकर,
कैसे कैसे इतराता है।।
सोच रहा हूँ बैठे बैठे,
ये कैसा गज़ब तमाशा है।।
©अतुल कुमार यादव.
ये कैसा गज़ब तमाशा है।
रहते कैसे लोग यहां पर,
किसी से न जिनका नाता है।।
पल दो पल में कोई कैसे,
इन रिश्तों में बध जाता है।
मौन, मौन की भाषा सुन कर,
दिल की तह तक को भाता है।।
इक अन्जाना सा वो रिश्ता,
फिर इन गीतों को गाता है।
संकल्पों की भाषा बनकर,
कैसे कैसे इतराता है।।
सोच रहा हूँ बैठे बैठे,
ये कैसा गज़ब तमाशा है।।
©अतुल कुमार यादव.
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