Sunday, 5 March 2017

दिल का दिपक

दिल का दीपक जलता रहता,
चोट जिगर की सहता रहता।
गीत तराना दिल को भाता,
मुझसे हर पल कहता रहता।
दिल में है जो गम का सागर,
आँसू बन कर बहता रहता।
नफरत चाहत दिल का हिस्सा,
हसरत बन कर चलता रहता।
नजरों में अब नजरें छिपती,
सूरज भी तो ढलता रहता।
अपने दिल के हिस्सें में तो,
बस सपना ही पलता रहता।
वो क्या जानें पीर पराई,
धुन अपनी जो रमता रहता।
पल कहता है सब सहता है
सब चलता है चलता रहता।।

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