Sunday, 5 March 2017

एक चिराग जलाते हैं

इंसानियत के
आसमाँ तले 
चलो
नादानियों का
एक चिराग जलाते हैं
और उसकी रौशनी में
उम्मीदों का एक पतंग
उड़ाते हैं
भेज देते हैं उसे
बुलंदियों के
उस शिखर पर
जहाँ परिन्दों की उड़ान
खत्म होकर
मुस्कान बिखेरती है
थोड़ा मुश्किल है...
थोड़ा मुश्किल है
पर असम्भव नहीं।
आज इस जमीं से
प्रेम के जज्बात
और
जिन्दगी की मायने
दोनों ही जुदा हैं
पतंग में लगी
अहसासों की डोर से
कामयाबी की महक
हकीकत, किस्मत,
खुशहाली व रौनक
सब गायब है।
आज पसरे इस सन्नाटे में
लगभग हर चेहरे से
चेहरे की रूहानी खुश्बू
तरसते वजूद
अनमने ख्वाब
नये अरमान
दूर खड़े नजर आते हैं,
दौर मुश्किल जरूर है
फिर भी
राग, द्वेष, लोभ, क्षोम, मोह
सब भूलकर
एहसासों के पन्नों पर
अल्फाजों के जो
अनगढ़ मोती
पिरोये गये हैं
उनके सुख में
सिमटकर
उनकी खुशियों से
लिपटकर
तुम, उनका
आज आलिंगन कर लो
यकीनन
तुम्हारी जिन्दगी का
गुलिस्तां
फिर से खिल उठेगा।।
      ©अतुल कुमार यादव.

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