Monday, 6 March 2017

नवजीवन के दीप जला कर

नवजीवन के दीप जला कर,
आशाओं के फूल खिलाकर,
रजनी के इस प्रथम पहर में,
चंदा की किरणों के संग संग,
सुरमई शाम के सांवलेपन पर,
इन आँखों को झील बना कर,
खुद ही खुद को आँक रहा हूँ,
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ।
शिलाखंडों पर बैठ कर देखों
ना जाने क्या मैं सोच रहा हूँ,
ये सतरंगी अतरंगी जीवन है,
और महकती चंदन सी रातें,
फिर भी इन रातों में बैठे बैठे,
खुद ही खुद को साध रहा हूँ,
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ|
मैं अपनी सींमा लाँघ रहा हूँ।।
पल पल की ये स्मृतियाँ मन में,
सार्थक भावों को उद्धृत करती,
ये अश्रुपूरित आँखें होकर तब,
बूँद बूँद गम दिल का हरती,
नीम के इन ठंडे झोकों से मैं,
विहगों को धीरज दे देकर ही
खुद को अब मैं आँक रहा हूँ।
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ।।
खोल कर मैं मन की खिड़की,
अब उनका चेहरा निरेख रहा हूँ,
अरमानों के पंख लगा कर के,
बस तुमको ही मैं देख रहा हूँ,
पर भीगी भीगीं ओस सी रातें,
और ये बहकी बहकी बातें हैं,
पर सच को सच में बाँध रहा हूँ।
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ।।
                      ©अतुल कुमार यादव.

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