कोई आता है राहों में फूलों को बिखराकर,
कोई गिर जाता है उन्ही फूलों से टकराकर।
कोई गिर जाता है उन्ही फूलों से टकराकर।
सम्भाल लिया जाता है कोई महफिल में जाकर,
पर हम तो सम्भलते हैं खुद ही खुद को समझाकर।
पर हम तो सम्भलते हैं खुद ही खुद को समझाकर।
जिनको सुलझाया हमने हरदम सच्ची बातों से,
वो चल देता हमको अपनी बातों से उलझाकर।
वो चल देता हमको अपनी बातों से उलझाकर।
उम्मीदों का बांध पुलिन्दा मैं दम भर देता हूँ,
वो कॉटें भरकर राहें चलता ठेंगा दिखलाकर।
वो कॉटें भरकर राहें चलता ठेंगा दिखलाकर।
मारा मारा होकर फिरता बनकर टूटा तारा
हमको खत्म किया जैसे काम रहे निपटाकर।
हमको खत्म किया जैसे काम रहे निपटाकर।
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