महफिल में गाने गुनगुनाने को साथ चाहिए,
गर कभी गिरूँ तो सम्भलनें को हाथ चाहिए।
धन दौलत हँसी खुशी सब कुछ मिल जायेगी,
पर जीने को मन मन्दिर में एक नाथ चाहिए।।
गर कभी गिरूँ तो सम्भलनें को हाथ चाहिए।
धन दौलत हँसी खुशी सब कुछ मिल जायेगी,
पर जीने को मन मन्दिर में एक नाथ चाहिए।।
अच्छा हुआ जो तुमने मुझे पहचान लिया है,
अब करो वही जो मन ही मन में ठान लिया है|
अरे! हमें तुम अकेला तो कभी सोचना ही मत,
क्युंकि सन्नाटे का दामन हमने थाम लिया है||
किनारों से बहारों से कहो अब इश्क़ है कितना?
नजारों से सितारों से कहो अब इश्क़ है कितना?
फँसा कर हर भँवर किश्ती सभी का हाल लेती है,
सहारों से हजारों से कहो अब इश्क़ है कितना?
हम अपनी किस्मत के सितारे अब खुद ही टांकेगे,
विरोधी हमेशा हमें हमारी औकात से कम ही आंकेगे|
हमें फर्क नहीं पड़ता दोस्तों! उनकी किसी माप से,
हमें पता है जिक्र करेगें तो हमारी ओर जरूर झांकेगे||,
हर बात पर तर्क मैं रख नहीं सकता,
कुछ लोगों में फर्क मैं कर नहीं सकता||
हमारा हिन्दोस्ताँ हमारे तो लिए स्वर्ग ही है,
अपनी सरजमीं को नर्क मैं कह नहीं सकता।
मसि कागज और हाथ नहीं है,
फिर भी कविता लिखते है|
ऐसे वाणी-पुत्रों का हम,
सदा अभिनन्दन करते है|
तू बता मैं सलीके से पेश आउँ कैसे,
अपने रंग में रंग के तुझे दिखाऊँ कैसे,
जब प्यार में प्यार से बना ली दूरी
तो फिर बता दिल से तुझे लगाऊँ कैसे|
आज भी दिल में तेरी मोहब्बत के दिये जलते है,
आँखों में तेरी ख्वाहिशों के कुछ सपने पलते है||
सोचता हूँ तुझे भुल जाऊँ हमेशा हमेशा के लिए,
पर खुद को भूल जाता जैसे चाँद सूरज ढलते है||
कोई किसी कलम का आकार देता है,
कोई किसी कलम का प्रकार देता है|
अरे अतुल तो कलम का वो वाजीगर है,
जो किसी भी कलम से किसी को निखार देता है||
मेरी आँखों के सारे सपने एक एक करके टूट रहे है,
अहसासों के सारे पत्ते एक एक करके छूट रहे है|
अपनी सारी दुनियाँ जिसकी खातिर छोड़ दी मैने,
आज उन्हीं के खातिर एक एक पल अब लूट रहे है|
वक्त का वक्त से वक्त भर कभी इन्तज़ार नहीं होता,
कल का कल से कल का कभी करार नहीं होता|
सलीके से तो हर चीज कर लेते है लोग वक्त से पहले,
इधर चाँद का चंन्द वक्त पहले कभी दीदार नहीं होता||
मन की सीपीयों से मोतियाँ निकाल लायी हूँ,
तेरे यादों के आँगन का कपाट खोल आयी हूँ|
दिल के पन्नों पर चली तेरे प्रेम की हवा फिर से,
तो टूटे लम्हों को मन के धागों से बाँध लायी हूँ||
ज़िन्दगी के पैमानों में खुद सिमट कर देखेगें,
गर पास आयेगें तो आपसे लिपट कर देखेगे|
दिखा देगें हम होता क्या है रिस्तों का असर,
जब आपको अपने ही रंगों में रंग कर देखेगें||
तेरी मोहब्बत के दिये हम दिल में जलाये फिरते है,
फिर भी कुछ लोग मुझ पर उँगली उठाये फिरते है|
ऐसे आलम में तू अगर कभी गुजर जाये सामने से,
तो मानो दिल पर काली घटाओं के बादल घिरते है||
कल दो शब्द तो हमने भी कहे थे तेरे प्यार में,
आज साहिल किनारें बैठे है 'हाँ' के इन्तज़ार में|
मेरी कोई ख़ता निकालेगी या तेरी रजा होगी,
उलझ कर रह गया हूँ मैं अब इसी विचार में||
बड़ी अजीब रही ज़िन्दगी कभी रौशनी न पा सका,
जो लहूँ था जिगर का वो कभी दिया न जला सका|
उसका हाल-ए-दिल पढ़कर खुद को सकूं मिल गया,
पर अपने दिल का हाल जवाब में लिखा न जा सका||
मिली जमाने से ठोकर तो खुद को सम्भाल लिया,
घुँट हँस हँस के पीया गमों को खुशियों में ढाल लिया|
बिखरने भी न दिया कभी भी ख्बाब इन आँखो का,
बनाकर ज़िन्दगी उनको बड़ी हसरत से पाल लिया||
ज़िन्दगी की गाड़ी जब ख़ुदा के हाथों में सौप दी है,
तो भरोसा उसकी ड्राईविंग पर करना ही पड़ेगा||
चरागों की कहानी कभी जज्बातों में न लिखना अतुल,
अँधेरी गलियों से होकर तुम्हें गुजरना ही पड़ेगा||
मैं तो कुछ लम्हा और तेरा साथ चाहता था,
आँखों में जमी हुयी फिर से बरसात चाहता था,
सुना हैं आज भी मुझे बहुत चाहती है वो मगर,
मैं उसकी जुबां से एक बार इज़हार चाहता था।
एक दिन देखना फिर से मैं निखर के आऊँगा,
इसी सभा में फिर से वो ही गीत गुन-गुनाऊँगा|
मुझे मझधार में छोड़ तुम साहिल पर आ गये,
देखना एक दिन तुमसे ज्यादा नाम कमाऊँगा||
चुरा कर पर परिन्दे का कभी उड़ान मत भरना,
भले ही भुखे रहो पर किसी का भाग मत हरना|
भले ही अँगुलिया ना फिराओं किसी के गालों पर,
पर करके इश्क किसी जिन्दगीं बरबाद मत करना||
दिल से दिल की बात लिखेंगे,
सत्य सदा पहचान लिखेंगे|
ख्वाब अभी जो बंजारे है,
एक दिन उनमें जान लिखेंगें||
नजर से नजर ढुढ़ता हूँ पर तू नहीं मिलती,
आसमाँ तो काफी है पर जमीं नही मिलती|
सुख गये दिल के सारे अरमान सारे जज्बात,
क्यूकि तू तो वही है पर अब तू नहीं मिलती||
अब रूह से रूह तक सब असर कर रहा,
ख़ाब आँखों का हाथों में यूँ सफर कर रहा|
हँसी खुशी सब मिल जाती है इन पुतलों में,
विश्वास होता है ख़ुदा इनमें बसर कर रहा||
अब रूठकर सबसे कहीं मैं दूर जाना चाहता हूँ,
छोड़कर चिन्तन सब कुछ भुल जाना चाहता हूँ।
अभी तक ढूढ़ता फिर रहा हूँ मैं अस्तित्व अपना,
अब सबके ह्रदय में खुद को बसाना चाहता हूँ।।
कभी माथे की सिकन तो कभी उदास उर्मियाँ पढूँ,
कभी परिक्षा के इस दौर में दो कदम तो आगे बढ़ूँ,
क्या होगा क्या नहीं अब यह छोड़ दे मन यही पर,
कुछ ऐसा भी तो कर जिससे सफलता को माथे मढ़ूँ|
मैं क्या बताऊँ कैसा कहर ढाती रही दुनियाँ,
बढ़ाया जब कदम तो आँखे दिखाती रही दुनिया,
किसको कहूँ अपना बता दो ऐ जहाँ वालों,
जब अपना ही बनकर पॉव फसाती रही दुनियाँ|
अब समझ आया दिल की आस्थायें जिन्दा होती,
मन्दिर के भगवान हमेशा पत्थर के ही होते है|
लोग भूल जाते है अक्सर और फरियाद करते है,
क्या सुनेगा ख़ुदा कहीं पत्थरों के कान होते है?
थोड़ी सी हँसमुख तो थोड़ी सी शर्मिली है,
मासूका मेरे दिल की आज भी पहेली है|
क्या बताऊँ यारों वो कैसी कितनी अलबेली है,
देखते हो साथ जिसको वो-तो सिर्फ सहेली है||
मंजिल से कुछ दूर तुम हो और कुछ ही दूर हम है,
अरे कुछ मजबूर तुम हो और कुछ मजबूर हम है।
जिन्दगीं के इस दौड़ में तो हम उलझे है इस कदर,
कि लगता एक मजदूर तुम हो एक मजदूर हम है।।
मेरी दिल्लगी ऐसे तोड़ देगी मुझको, पता न था,
दुनियाँ इस कदर मोड़ देगी मुझको, पता न था|
कभी सजाये थे ख़्वाब जिनके, ख़्वाबों में हमने,
ख़्वाबों मे लाकर छोड़ देगी मुझको, पता न था|
हम गलत ही लिये फिर रहे जो हमारी अर्जी है,
मेरी समझ से संसद में बैठे वो सारे फर्जी है|
हम अपने काम को खुद ही अन्जाम तक पहूँचाये,
ये बात आप भी मानियें आगे आप की मर्जी है||
दिल के बात अब अपना मुँह से कहात नईखे,
अपने लोगन के दिहल दर्द भी अब सहात नईखे|
का करी दिल के बात दिमाग तक पहूँचल गईल,
केतना मनाई अब बिना कहले भी त रहात नईखे||
आज सोचता हूँ एक किस्सा सुना दूँ अपने शहर का,
जब होश न हुआ करता था आठ के आठो पहर का|
लोग व्यस्थ रहते थे एक-दुसरे की बूराईयाँ देखने में,
डालते थे फूट ऐसी जो काम करती थी जहर का|
वो मेरी है मैं उसका हूँ, कभी बताया न था,
यादों से वादो से इरादो से, कभी सताया न था|
वो छूप कर आँसू बहाये दोस्तों, ऐसा हो नहीं सकता,
क्युकि दिल से अपने तस्वीर उसकी, कभी हटाया न था||
गर तू ना रहीं तो मोहब्बत मुझसे कौन करेगा,
तेरे बगैर शोना बाबू राजा रे मुझे कौन कहेगा|
तुझसे ही होती है आबाद मेरी दुनियाँ समझ ले,
तेरे बगैर प्यार-व्यार की बातें मुझसे कौन करेगा||
तुम्हारे खून का बदला खुन से लेगें,
तुम्हारी धुन का बदला धुन के लेगें|
बनो चाहे तुम कितने भी बड़ें सिकन्दर,
आयेगें तुम्हारी गली तो "कह के लेगें"||
आज हमारे दिल दिमाग में बसे हजारों मित्र है,
हल पल खिंचता उनका ही काय कल्प चित्र है|
हमारे मित्र कैसे है यह न बताऊँगा कभी दोस्तों,
पर सबसे बेहतर सबसे बड़े मित्र मेरे पित्र है||
इन राहों से उन राहों पर राहों में जाना पड़ता है,
फिर राहों में दर-दर की ठोकर भी खाना पड़ता है|
मंजिल में ही रहकर तुमने जब चुन रखी है ऐसी मंजिल,
तब ना चाहते हुए भी हौसलों में हिम्मत लाना पड़ता है||
यादों के गुरूरों में महज हम ही रहे डूबे,
तुम्हारे ही गुरूरों में फकत हम ही रहे डूबे,
तुम्हें मैं प्यार का अपने महज किस्सा ही मानूँ तो,
तुम्हारे इन गुरूरों के गुरूरों में रहे डूबें||
करके सामने दर्पन हमारा यार रूठा है,
कोई है वजह जिससे मेरा संसार रूठा है|
ताल्लुक क्या तुमसे ये जमाना जानना चाहे,
बताना तुम हकीकत को मेरा जब प्यार रूठा है||
मुश्किलों से सदा लड़ना तुम्हीं से सीख लिया मैने|
गमों में भी सदा हँसना तुम्हीं से सीख लिया मैनें|
लगा कर वक्त का शीशा बदलते हैं यहीं मौसम,
मगर तपकर बदलना खुद तुम्हीं से सीख लिया मैनें।।
किताबें तो यही मुझको कभी सोने नहीं देती,
तन्हाई में यही अक्सर कभी रोने नहीं देती।
दुनिया के बवण्डर में भले ही भूल जाओ तुम,
मगर ये भीड़ में मुझको कभी खोने नहीं देती।।
किसानों के दरद को वो भला क्या जान पायेंगे,
जो भरते दिल में हैं नफरत भला क्या जान पायेंगे।
निकलकर देख लो दुनिया किसानों की रही कैसी?
तरसती आँख हैं रोती भला क्या जान पायेंगे।।
हाल-ए-दिल का ये मेरे हम्ही से पुछ बैठा है,
अभी जिन्दा हूँ या मुर्दा अभी से पुछ बैठा है।
किताबें खोलके रख दी पढ़ले जिन्दगी मेरी,
मगर ये दिल की आहों को सभी से पुछ बैठा है।।
वो आँखों के चिलमन से पलकों का पर्दा गिराकर चली तक गयी,
कल छोड़ी थी जो हाथ गुस्से में उसी को पकड़ने उस गली तक गयी।
आँख दरिया दिल शीशा तल्खियत सी उस मोहब्बत का आलम है कि
वक्त के इन जालिम हाथों से कुचली वो कली फिर छली तक गयी।।
घटायें तोड़ कर दिल की खुशियाँ वो मनाती है,
सजर गीतों का जो मेरे सदा खुद को बताती है।
जिन्दा है नहीं लेकिन अतुल बरबाद है अब तक,
मेरी गीतों मे आकर वो सदा खुद ही नहाती है।।
माँ की आँख में हमने सदा ममता ही देखी है,
पिता के प्रेम में हमने सदा समता ही देखी है।
झुका दे जग को कदमों में दुआओं में रही शक्ति
पिता माता की भक्ति में यही क्षमता ही देखी है।।
बहुत खामोश होकर भी बहुत कुछ कह गये आँसू,
तुम्हारे याद में फिर से जरा सा बह गये आँसू ।
गिरे पत्तों के जैसे हम तुम्हारे पॉव के नीचे,
खिला के फूल खुशियों के बहुत कुछ सह गये आँसू।।
न जाने याद में किसके कही पर बैठ जाता हूँ,
अमीरी है नहीं मुझमें गरीबी खुद में पाता हूँ।
सवालों में लिए तुम भी कभी तो बैठ कर देखो,
बड़ा आसान सा हूँ मैं समझ मुश्किल से आता हूँ।।
निशा चुपचाप ढलती है हमेशा दिन ही रोता है,
तुम्हारी याद मे हरदम हमारा दिल ही खोता है।
सिखाती हार आँखों को उदासी में सदा जीना,
नहीं सब जीत होती है कभी कुछ खाब होता है।।
जरा सा दर्द होने पर जरा सा टूट जाता हूँ,
तुम्हारी धड़कनों में मैं हमेशा डूब जाता हूँ।
समन्दर क्या सिखायेगा हमे अब मौज में रहना,
सुबह होते ही अक्सर मैं लहर से रूठ जाता हूँ।।
दिसम्बर के महिने में नवम्बर सा ही छाये हो,
आये हो नहीं फिर भी मिलन की गीत गाये हो।
जनवरी से दिसम्बर तक तुम्हें ही ढूढ़ता रहता,
आँसू बनकर आँखों के तुम्ही दिल में समाये हो।।
परिंन्दा सरहदों से ही यहां अंजान होता है,
सहारे चाँद के हरदम यहां रमजान होता है।
इबारत हम नई लिख दे कहो तो आसुओं से ही,
गरीबों में अमीरों का जहाँ सम्मान होता है।।
किसी के ठाठ पर कोई जहां तूफान होता है,
लगे हालात से ठोकर तभी इंसान होता है।
जिसे है मिल गया मौका बुलंदी पर पहुँचने का।
उसी को देख कर के क्यूँ सदा सम्मान होता है।।
अनाड़ी ही रहा फिर भी सदा गुण गान होता है,
सुरों में बोल देने से सदा जय गान होता है।
पलटना मत कभी पन्ने हदें सब टूट जायेगी,
कला अतुल्य जहां पर है सदा सम्मान होता है।
जमाने में सदा दिल का यूँ' ही व्यापार चलने दो,
भरोसा प्यार का उनको कई सौ बार मिलने दो।
मुहब्बत ने न जाने क्युँ किया हमपर सितम इतना
जवानी के मुकद्दर से जरा शबनम पिघलने दो।।
जमाने को जमाने से शिकायत थी शिकायत है,
दिखाना आँख ही सबको रवायत थी रवायत है।
इजाजत हो हमें भी तो कहूँ कुछ राज की बातें,
बिछुड़ने की सदा जग में रियायत थी रियायत है।।
अमीरों में बनावट की कला अच्छी नहीं लगती,
हमें इंशानियत की सब धरा अच्छी नहीं लगती।
दुआ हम जाहिलों की क्या कभी जादू भरी होगी?
गरीबीं में कयामत की हवा अच्छी नहीं लगती।
कमी महसूस होती है जरा दिल में ठहर जाओ,
हवा बनके अभी तुम रूह में मेरी उतर जाओ।
तुम्हारे साथ में दुनियाँ हमेशा ही लगी जादूँ,
कयामत रहगुजर हो तुम चले अपने शहर जाओ।।
उठे हैं हाथ सजदे में सलामत तुम सदा रहना,
चले जब भी हवा पुरवा फिजाओ में महक भरना।
कयामत तक रहूँगा साथ तेरे ऐ मेरे हमदम,
निगाहों से हमेशा तुम अतुल जादू किया करना।।
तू कहे औ जिन्दगी को खास लिख दूँ,
दूर होकर आज दिल के पास लिख दूँ।
नफरतों के दौर में मुश्किल नहीं कुछ,
इश्क है तो इश्क का अहसास लिख दूँ।।
मैं सभी को छोड़कर अब अनकहे जज्बात लिख दूँ,
ख्वाब में जो तुम मिलो तो आज दिन को रात लिख दूँ।
जिन्दगी का साथ पाकर आ गया मुझको पिघलना,
बेखुदी में अक़्स या फिर अश्क की बरसात लिख दूँ।।
फ़िज़ाओं में मुहब्बत के सितारे ढल गये होंगे,
तुम्हारे ख्वाब आँखों के यकीनन जल गये होंगे।
शरारत की अदाओं से नहीं इन्कार है मुझको,
तुम्हारे इश्क़ के जादू कहीं पर चल गये होंगे।।
कभी कभी ये चंचल मन फूलों से घायल हो सकते हैं,
कभी कभी ये चंचल मन काटों के कायल हो सकते हैं।
नहीं जरूरी है धुन निकले केवल मन की बाँसुरियों से,
कभी कभी चंचल मन भी पॉवों के पायल हो सकते हैं।।
हमारी लेखनी ही अब हमारी जान बन जाये,
करू कोई सृजन गर तो सुरीली तान बन जाये।
करें कागज अलंकृत मुझ अनाडी की कलम हरदम
कला इस लेखनी की ही अतुल पहचान बन जाये।।
गज़ब की जिन्दगी है ये हँसी इक शाम कर दी है,
अदब की जिन्दगी में ही हमें गुमनाम कर दी है|
नहीं मैं सोचता इतना किसी के साथ के किस्से,
भले ही जिन्दगी अपनी हमारे नाम कर दी है।।
कभी हम गीत गाते हैं कभी मल्हार गाते हैं,
कभी हम कृष्ण रंगों में सजा संसार पाते है।
जरा सी बात पर मिलती सभी को गालियाँ ही अब,
मगर बस चाहने भर से यहाँ कुछ मार खाते हैं।।
कहो मजबूरियाँ कैसी शहर से यूँ निकलने की,
पुरानी छोड़ कर मंजिल शजर अपना बदलने की।
भुलाये हम भला कैसे खबर अच्छी नहीं है जो
मुसीबत के दिनों की थी डगर तुम तो बहलने की।।
किसी के दिल की' गहराई झुकीं नज़रें बता देतीं,
किसी के मन की' तरुणाई उठीं नज़रें बता देतीं।
मुझे मजहब़ नहीं मालूम नजरों की दुआओं का,
किसी के गम की' भरपाई कहीं नजरें बता देती।।
किसी के मन की' तरुणाई उठीं नज़रें बता देतीं।
मुझे मजहब़ नहीं मालूम नजरों की दुआओं का,
किसी के गम की' भरपाई कहीं नजरें बता देती।।
कहो मजबूरियाँ अपनी शहर से यूँ निकलने की,
पुरानी छोड़ कर मंजिल शजर अपना बदलने की।
भुलाये हम भला कैसे खबर अच्छी नहीं है ये
मुसीबत के दिनों की थी डगर तुम ही बहलने की।।
अदब की जिन्दगी है ये अजब अन्दाज लिखता हूँ,
रहूँ खामोश फिर भी राष्ट्र की आवाज लिखता हूँ।
उड़ानों पर कभी अपनी नहीं अफसोस था लेकिन,
परिन्दा हूँ, परिन्दों की अलग परवाज लिखता हूँ।।
शज़र भी तुम्ही हो सहारा तुम्ही हो,
मे'रे जिन्दगी का नजारा तुम्ही हो।
अभी प्रीत की डोर में बँध रहा हूँ,
समन्दर तुम्ही तो किनारा तुम्ही हो।।
जलाकर दीप को हमने उजाला कर लिया देखो,
भुलाकर दर्द को अब तो किनारा कर लिया देखो।
सुमन बिखरे पड़े थे जो घरों की चहदिवारी में
सजा कर घर सलीके से गुजारा कर लिया देखो।।
सियासत में जरा देखो बगावत कौन करते हैं,
बगावत कर भी' लेते तो शिकायत कौन करते हैं।
असूलो में बधें हम सब खिलाफत कर नहीं सकते,
भला देखो खिलाफत की हिमाकत कौन करते हैं।।
✍©अतुल कुमार यादव.
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