Sunday, 5 March 2017

निराशा के जीवन में

तन, 
ह्रदय, 
मन, 
दृष्टि, 
मौन, 
क्रंदन,
धैर्य
और शाहस
बस रूप में बाधित हैं।
रात में जागती
भोर की संभावनाओं को
क्युँ भरमा रहे हो??
मेरी दृष्टि
सीमित है,
आशा-निराशा के जीवन में
हताशा-घुटन को
आवाज देकर
तन-मन को दुविधा में डाल
व्यथा को माथ लिए
अब
क्युँ सकुचा रहे हो??
मेरी आस
टिकी है
तुम पर,
मेरे प्रश्नों का
उत्तर दे दो।
दिल है
भरा
उदासियों से,
कुछ तो जरा
शिकायत दे दो।
हजारों खुशियाँ
संग में हो तो,
हँसी-खुशी सुझाव
और बस
इनायत दे दो।।
©अतुल कुमार यादव.

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