Monday, 6 March 2017

नहीं कोई खता मेरी

नहीं कोई खता मेरी नहीं कोई रही गलती,
बनाकर दूरिया मुझसे सदा खुशिया रही चलती।
बड़ी तकलीफ देती है तुम्हारे साथ की यादें,
हवाओं से न पूछो रात अब कैसे रही ढलती।
सहारा वो तुम्हारा आज तक जो मिल गया होता,
किनारे ही किनारे नाव दुख की हाथ को मलती।
जरा बेचैन होती है बना लूँ जिन्दगी उसको,
हमारी याद जिसके दिल सदा खुद ही रही जलती।
मुझे जीना सिखाकर जो जुदाई दे गयी मुझको,
सिखा पाया नहीं कुछ भी यही बातें रहीं खलती।
नहीं मैं हार माना हूँ नहीं ख्वाहिश रही उसकी,
मुहब्बत दिल नहीं मेरे न वो खुद ही रही पलती।
कहीं दिखती नहीं मंजिल न कोई राह दिखती है,
अतुल तुम खुद बताओ यार कब तक साथ वो चलती।
                                            ©अतुल कुमार यादव.

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