मैं चाँद सितारा रातों का,
नाज हुआ ये अंदाजों का।
नाज हुआ ये अंदाजों का।
लिखनें में तो मैं हूँ माहिर,
बस ज्ञान नहीं मात्राओं का।
बस ज्ञान नहीं मात्राओं का।
मुश्किल से मैं क्युँ घबराऊँ,
जब नायक हूँ अरमानों का।
जब नायक हूँ अरमानों का।
जो चलता वो बढ़ता आगे,
बस खेल यही जज्बातों का।
बस खेल यही जज्बातों का।
जलता बुझता रहता मंजर,
जैसे नादान चिरागों का|
जैसे नादान चिरागों का|
No comments:
Post a Comment