Tuesday, 7 March 2017

नये आसमाँ की तलाश

चलो...
आज एक नये आसमाँ की 
तलाश करते हैं
ख्वाहिशों के बादलों में
जिस विरानियों ने
अपना घर बना रखा है
उसे इस आजाद फिजाओं की
वादियों से अलग करके
अँधेरा छाटते हैं
भावनाओं और एहसासों के तले
एक उजला सूरज उगाते हैं
जिससे अपने चेहरे पर
फैले...
इन उदासियों को
अपने से...
दूर भगाते हैं।
उल्फत की रौशनी में
रूस्वाईयों के बादलों पर
चाहत और प्यार का
जो इन्द्रधनुष
इन पहाड़ों और झरनों ने
सजाये हैं
चलो...
उन्हें
अपने जज्बातों के
मचलते तड़पते अरमानों से
फिर से महकाते हैं।
जिन्दगी की
बनती-बिगड़ती राहें
ठीक उसी तरह से हैं
जैसे कि
इन पहाड़ों के बीच से
ये निकलती नदियाँ
या गिरते झरने।
ये हमें अक्सर बताते हैं
खामोशियों की भी
इक अपनी जुबाँ होती है
जिससे दर्द भरी यादों के
सिलसिले कभी
थमते नहीं और
अनकहे जज्बात
अपनी आवाज लिये
सब कुछ बयां करने को
सिहर उठते हैं।
इस हरियाली भरे
गुलशन की फिजाओं में
श्वेत मोतियों सी चमकती
इस धार के अतृप्त अरमानों को
अगर तुम महसूस कर सको
या फिर दिल के पन्नें को
एहसासों से भिगोती कलम
तुम्हारे मन की
खिड़कियों को खोले
ताजी हवाओं के साथ दस्तक दे
तो उसके एहसासों को
उसके अरमानों को
उसकी ख्वाहिशों को
उसके मधुरिम भावों को
तुम अपने में समेट लेना।
           ©अतुल कुमार यादव.

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