जवाबों के लिए फिर से सवालों को उछाला है,
नहीं हासिल हुआ कुछ भी नहीं दिल में उजाला है ।
नहीं हासिल हुआ कुछ भी नहीं दिल में उजाला है ।
यकीनन प्रीत जिन्दा है करे जग को सदा रौशन,
सुलाती अब ग़ज़ल हमको यही इक शौक पाला है।
सुलाती अब ग़ज़ल हमको यही इक शौक पाला है।
रहा था भक्त तेरा जो खुदा खुद ही बना बैठा
करूँ किसका मैं अब सजदा मुझे सकते में डाला है।
करूँ किसका मैं अब सजदा मुझे सकते में डाला है।
उलझकर मैं सुलझता हूँ फिजाओं में हमेशा ही,
सवालों के समन्दर से अभी खुद को निकाला है।
सवालों के समन्दर से अभी खुद को निकाला है।
खुले हैं द्वार दौलत के जुगत खाने की तुम कर लो,
गरीबी में 'अतुल' वरना नहीं मिलता निवाला है।
©अतुल कुमार यादव
गरीबी में 'अतुल' वरना नहीं मिलता निवाला है।
©अतुल कुमार यादव
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