Sunday, 5 March 2017

जो ख्वाब था बिखर गया

जो ख्वाब था बिखर गया,
कुछ इधर कुछ उधर गया।
सुकूं का कुछ पता नहीं,
सुख किधर दुख किधर गया।
श्याह रात औ बात में,
एक रास्ता गुजर गया।
अजीब सी है जिन्दगी,
लहू दिल में उतर गया।
चाँद दिप्त है गली में,
सुना, और बाहर गया।
पलक अभी झपकी नहीं,
फिर चाँद कब उतर गया।
भटका डगर डगर सही,
पर अन्तत: सिहर गया।
साथ में चला ही नहीं
मैं आज तो मुकर गया।
आँखों में सपनें लिए,
बीत आठों पहर गया।
"अतुल" गली में है नहीं,
न जाने किस शहर गया।
          ©अतुल कुमार यादव.

No comments:

Post a Comment