Sunday, 5 March 2017

उड़ जा पंक्षी नील गगन में

उड़ जा पंक्षी नील गगन में,
उड़ता जा तू अपनी मगन में।
चार पंख लगे तेरे पंख में,
चार पंख लगे तेरे पंख में,
हौसला कम ना हो तेरे रंग में।
उड़ जा पंक्षी नील गगन में,
उड़ जा पंक्षी नील गगन में,
उड़ता जा तू अपनी मगन में।
मन का पंक्षी भी छुना चाहे,
सूरज की पहली ही किरन।
जैसे धरती भी मिलना चाहे,
आसमान अब तेरे संग में।
उड़ जा पंक्षी नील गगन में,
उड़ता जा तू अपनी मगन में।
तू उड़ता अम्बर पाने को,
मिलती है बस तुझे निचायी।
अब रमता जा तु अपनी रमण में,
ला एक नया जोश अपने जेहन में।
उड़ जा पंक्षी नील गगन में,
उड़ता जा तू अपनी मगन में।
मंजिल कठिन है राह है टेढ़ी,
तुझे ही करनी है अब सीधी।
उड़ कर अब चलते जाना है,
करनी है यात्रा पूरी एक पल में।
उड़ जा पंक्षी नील गगन में,
उड़ता जा तू अपनी मगन में।।
                 ©अतुल कुमार यादव

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