Sunday, 2 April 2017

किसी के चाहने भर से

किसी के चाहने भर से ये' दुनिया हिल नहीं सकती,
किसी के चाहने भर से गमों में सिल नहीं सकती।

बहुत लम्बी ये' दुनिया है बहुत चौड़ी ये' दुनिया है,
विरासत में किसी को भी अचानक मिल नहीं सकती।

चले जो बाप के दम पर उन्हें अब कौन समझाये,
यहाँ आदाब कर लेने से मंजिल मिल नहीं सकती।

शराफत खूँन के अन्दर हमेशा दौड़ती रहती,
शरीफों के असूलों से जरा भी हिल नहीं सकती।

सजा था फूल राहों में सफर पर जब चला मुश्किल,
फलक तक तो 'अतुल' कलियाँ महल की खिल नहीं सकती।
                                                         ©अतुल कुमार यादव.

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