Sunday, 5 March 2017

फिर से दूरी साध रहा हूँ

फिर से दूरी साध रहा हूँ,
खुद से खुद को आँक रहा हूँ।
नदी धार में बहते बहते,
मन की बातें कहते कहते।
अपने दिल को जान रहा हूँ,
अपने को पहचान रहा हूँ।
खुद से खुद को हार रहा हूँ,
फिर से दूरी साध रहा हूँ।
मन्दिर मस्जिद द्वारे द्वारे,
पुष्प उगेंगे न्यारे न्यारे।
उन पुष्पों की अभिलाषा का,
जीवन की हर आशा का,
एक गीत मनुहार रहा हूँ,
फिर से दूरी साध रहा हूँ।
बिखरी बिखरी साँसें होगी,
काली काली रातें होगी।
काली काली उन रातों में,
चॉद सितारों की बातों में।
खुद को मैं पहचान रहा हूँ,
फिर से दूरी साध रहा हूँ।
जीवन राहें मुझे सजाना,
शब्दों से कुछ नहीं बताना
सूरज के अब ढलते ढलते,
पुन: मिलेंगे चलते चलते।
तब तक आँखें खार रहा हूँ
फिर से दूरी साध रहा हूँ।
फिर से दूरी साध रहा हूँ,
मन ही मन को मार रहा हूँ।
अपने को पहचान रहा हूँ,
बस अब दूरी साध रहा हूँ।
           ©अतुल कुमार यादव.

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