Sunday, 5 March 2017

बन्धन सारे तोड़ दे

अब रिस्ता रखना छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे|
मखमली सपनों की दुनिया,
तू जिसे छुपाकर है रखी,
उसी दुनिया में देख रहा,
मैं सपनों सी ये जिन्दगी,
सपनों की डोरी तोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे|
सारी खुशी तो बिखर गयी,
याद बचपन की निखर गयी,
साथ तू हरदम साथ चली,
पर कदम कदम पर है छली,
चल जीवन राहें मोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे|
मैं दण्ड भुजों पर हूँ टिका,
अपनो के लिए न हूँ बिका,
ये जब कभी भी पुष्प खिला,
सुख अपनों से ही है मिला,
अब मेरी बाहें छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे|
अब उपवन भी न दिखे हरा,
जग नश्वर मिथ्या से भरा,
बंजर धरती से ह्रदय में,
ना जाने क्या क्या है पला,
घातों का पलना तोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे|
भोर में ही उदित शाम है,
गहन निशा तेरे नाम है,
"अतुल" तम से तमतमा रहा,
औ सकल प्रकाशित रवि करे,
तब दीपक लिखना छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे|
अब रिस्ता रखना छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे||
            ©अतुल कुमार यादव.

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