Sunday, 5 March 2017

तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ

तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे प्यार का किस्सा,
हमें मशगूल कर देता,
तुम्हारे प्यार में फँसकर,
मैं अक्सर भूल कर देता,
नहीं अब भूल करनी है,
नहीं मशगुल है होना,
हमें तो चाँद बनना था,
धरा के साथ रहना था,
मगर सूरज बना दी तुम,
जलन अब छोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।१
कहा पहले बहुत तुमसे,
मेरे से दूर ही रहना,
अदाओं पर नहीं मरता,
यही तो था मेरा कहना,
तुम्हारे बिन नहीं लगता,
कहीं पर अब हमारा दिल,
तुम्हें अब संग में लेकर,
गुजरना है बड़ा मुश्किल,
लिये इन्हीं विचारों को,
जिगर मैं तोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।२
जमाना जानता ये भी,
सियासत प्रेम में पलती,
निकलना है तेरे दिल से,
मगर यादें बहुत छलती,
नहीं कोई जगह तेरी,
नहीं कोई जगह मेरी,
लुटा हर बार है ये दिल,
तुम्हारे दिल कि बस्ती में,
न आना लौटकर अब तुम
मुहब्बत छोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।३
                                            ©अतुल कुमार यादव.

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