राज उनके जब खुले तब बातें बनाते हैं,
आज करोड़ो समेटे वो आखें दिखाते हैं।
आज करोड़ो समेटे वो आखें दिखाते हैं।
भूख से व्याकुल परिन्दें जब लौट आते हैं
वक्त कितने भी बुरे हो आखों सुहाते हैं।
वक्त कितने भी बुरे हो आखों सुहाते हैं।
चोट पर ही चोट खाते हैं जो सदा गहरे,
दर्द क्या है सच वही तो हमको बताते हैं।
दर्द क्या है सच वही तो हमको बताते हैं।
जिन्दगी के सब मजे लेते वो सियासत से,
और पल पल आज नेता हमको पढ़ाते हैं।
और पल पल आज नेता हमको पढ़ाते हैं।
हम भरोसा क्या करें अब उन रहनुमाओं से,
रोग जैसे साथ चलते सच को छिपाते हैं।
रोग जैसे साथ चलते सच को छिपाते हैं।
कर्म पथ का हूँ मुसाफिर चलता अकेले हूँ,
कर्म से ही हम सदा उर सूरज जलाते हैं।
कर्म से ही हम सदा उर सूरज जलाते हैं।
आ गया गर वक्त मुश्किल तुम उस घड़ी देखना,
साथ में जो हैं खड़े वो क्या क्या कराते है।।
©अतुल कुमार यादव.
साथ में जो हैं खड़े वो क्या क्या कराते है।।
©अतुल कुमार यादव.
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