Sunday, 5 March 2017

सूरज की किरणें

सूरज की किरणें
उन्मुक्त गगन से चलकर
जब वसुधा पर उतरती हैं
तब बातें करती हैं
धरा पर पड़े 
चमचमाती
श्वेत मोतियों से
हरे भरे गेहूँ की
छोटी छोटी पत्तियों से
और
अपने ऊष्मा का
उनमें संचार करती है
जगाती हैं
उनके अन्दर के ओज को
स्वाभिमान को
चाहती है वो भी
उसकी तरह
अपनी सुबह की आभा खोकर
उनके जैसा ही बन जाये
पर मोतियों की नमीं
किरणों को बताती है
अपने ​मनुहार​ की भाषा
और सींच देती है
किरणों को
अपने प्रेम निवेदन की भाषा से
पर किरणों के अन्दर
निहित ऊष्मा
हर दिन
अपने गर्मी के ​प्रहार​ से
गायब कर देती है
शीत रूपी मोतियों के
अभिमान को, और
गायब कर देती
उसके नमी को
साथ ही साथ
उपहार​ में छोड़ देती
सुबह की सुन्दरता
शीत का सौन्दर्य
ह्रदय की गहराई
मनुहार की भाषा
और सुबह का यौवन
जिससे सूरज सीधे
बढ़ जाता है सुबह से
दोपहर की ओर
जिसका वजूद
जिसका अस्तित्व
जिसका अहसास हमेशा ही
सुबह से कम होता है|
        ©अतुल कुमार यादव.

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