Wednesday, 29 March 2017

लबों पर आज मेरे फिर

लबों पर आज मेरे फिर उसी का नाम आया है,
लिखी है "जिन्दगी" उसने यही पैगाम आया है|

बहाने हैं रुलाने के हमारे पास तो ढेरों,
मनाने क्युँ नहीं आया यही इल्जाम आया है|

निभाती वो गयी रिश्ते सभी रिश्ते निभाने को,
लिफाफा सादगी का फिर लिए अंजाम आया है|

पुरानी याद के पन्नें किताबों में छिपे बैठे,
इशारों ही इशारों में इशारा काम आया है|

नई दुनिया बसा ली तुम थमी थी डोर रिश्तों की,
निकलते आँख से आँसू सही अंजाम आया है|

न पूछो तुम भला भी कुछ वफायें चीखकर कहती,
दुआवों ही दुआवों में हिज़रत सलाम आया है|

बचा लो तुम मुहब्बत को नहीं तो ब्याह जायेगी,
पिटारे में जहर भरकर "अतुल" के नाम आया है||
                                       ✍©अतुल कुमार यादव

जिन्दगी में खैरियत का

जिन्दगी में खैरियत का सिलसिला कुछ भी नहीं,
हम उसूलों पर चलें हैं सिरफिरा कुछ भी नहीं।

वक्त की पाबन्दियों में चल रहा मैं रात दिन,
दरबदर हूँ मैं भटकता माजरा कुछ भी नहीं।

हर घड़ी है याद रखनी बस बड़ों की बात को,
ज्ञान की इन वादियों का दायरा कुछ भी नहीं।

हर तरफ अंधेर है यह रौशनी को क्या पता?
इक जलाना दीप मुझको मशवरा कुछ भी नहीं।

हसरतों को तुम लिए दिल में उतरकर देख लो,
इन निगाहों का तेरे बिन आसरा कुछ भी नहीं।
                                       ©अतुल कुमार यादव

खुदा ने सौंप दी मुझको

खुदा ने सौंप दी मुझको कई दुनिया हिसाबों में,
सुकूँ मिलता नहीं बस आज दौलत की किताबों में।

फँसे हम ही रहे अब तक गली में आप की देखो,
खुदा ने रख दिया नक्शा जमीं का माहताबों में।

तलाशी हैं सभी लेते मगर हासिल नहीं कुछ भी,
मिले हैं सब सबब मुझको सियासत के नकाबों में।

हजारों ख्वाहिशें मेरी दफन हैं आज सीने में,
नजर के ही नजारे हैं हया के इन हिजाबों में।

कली अब तोड़ मत लेना समझकर फूल जज्बाती,
बिखरती है सिमटती है बनी काँटा गुलाबों में।।
                                       ✍©अतुल कुमार यादव

Monday, 27 March 2017

लघु-कथा

           आज बस के कोने में आखिरी सीट पर बैठा लोगों को चढ़ता उतरता देख रहा था। कुछ लोग बस में चढ़े टिकट लिये और सफर समाप्त होते ही उतर लिये। वही कुछ लोग चढ़े तो लोगों को खुद से जोड़ने लगे,राजनीति से लेकर देश काल की हजारों बातों का ज्ञान बाटने लगे। शेष बचे कुछ लोग बस में चढ़े तो टिकट लिये दो कदम इधर उधर हुए और दस मिनट के सफर में ही लोगों से लड़ने झगड़ने लगे। ऐसा देख कुछ लोग बीच बचाव में लग गये तो कुछ उकसावे में और कुछ लोग सब कुछ देखते सहते उदासीन बने रहे, जो स्वाभाविक भी है। शायद यही "बस" दुनिया है और सवारियाँ हम आप जैसे करोड़ों लोगों की जिन्दगी और लड़ना झगड़ना चार दिन की जिन्दगी के सुख दुख। अब निर्भर हम पर करता है कि हमें सुख दुख में विचलित होना है या एक सा बने रहना है।
                                                                                                                            ©अतुल कुमार यादव.

पेट की पीड़ा

आज के जिन्दगी की
विवशता ही कुछ ऐसी है
कि आँखों के ख्वाब
न मुकम्मल होते हैं
और ना ही कभी खत्म।
बदलते लोग
और
लोगों की बदलती फितरत
न तो थमेंगी
और ना ही रूकेगी।
बस... आज की ये
लाचारियाँ
कुछ ऐसी हैं
कि एक कन्धें पर
शिक्षा का अधिकार
तो दूसरे पर
पेट की पीड़ा
टँगी
नजर आती है।
आज उन आँखों में भी
दिन रात पढ़ने की
पीड़ा पलती है, जिनमें
लाचारी, आर्थिक तंगी
और विवशता ने
अपना घर बना लिया है
और उनके
सारे सपनों को
आज
खंडित कर दिया है।
अब सामने जब भी
कोई बच्चा
शिक्षा के अधिकारों को
कंधें पर लटकाये
मुँह चिढ़ाता है
तब, आरजू के पन्नें
बिखरने लगते हैं
सपन सलोने
टूटने लगते है,
गमजदी के पर भी
निकलने लगते हैं
और अन्तत:
आँखों के सपनें
थक हार कर
बेकरारी की पीड़ा के मध्य
बेजुबान हो कर
हमेशा हमेशा
हमेशा के लिए
मजबुरी और गरीबी की
इन पसरी
चहरदिवारियों में
दफन हो जाते हैं।
          ✍©अतुल कुमार यादव

Thursday, 23 March 2017

राजगुरू सुखदेव भगत


राजगुरू सुखदेव भगत को हरदम शीश नवाता हूँ।
भारत के कदमों में झुक कर मैं श्रद्धा सुमन चढ़ाता हूँ।

आजाद लहू है आज देश का जिनके दम से,
उनको जिन्दा आज देश के रज कण में पाता हूँ।

जिनकी शहादत है जिन्दा अब तक देशी माटी में
वैसा ही मै वीर सपूत इस मिट्टी में उपजाता हूँ।

कलम ऋणी है देश ऋणी है अब तक जिनकी गाथाओं का,
नतमस्तक सम्मुख मैं उनके अक्सर खुद हो जाता हूँ।

इन्क़लाब ज़िन्दाबाद अब गूँज उठे भारत वन में,
मेरा अन्तर्मन तो वन्दे मातरम् गाता औ दोहराता हूँ।
                                               ✍©अतुल कुमार यादव

Wednesday, 22 March 2017

अश्क का छोटा कतरा

मैं अश्क का
एक छोटा सा
वो कतरा हूँ,
जिसे तुम
जब चाहो तब
बहा सकते हो,
जब चाहो तब
अपने लफ्जों में
अपने अल्फाजों में
अपनी भावनाओं में
मोतियों की तरह
पिरो सकते हो।
वैसे भी स्याह दर्द
की राहें
इतनी भी
आसान नहीं होती
कि तुम बस चलते जाओ
और तुम्हें तनिक भी
तकलीफ न हो।
तुम जब भी
मेरे बनाये रास्तों
चलोगे...
तो यादों का गीलापन
तुम्हें रोकेगा, टोकेगा
और अन्तत:
खुद में समेट लेगा।
तुम मुझे नजरों की राह
से गिरा तो रहे हो
पर क्या तुम
मुझे इन राहों पर चलकर
भूला पाओगे?
अगर भुला सकते हो
तो भूला देना,
और अपनी यादों की,
वादों की,
इरादों की दुनियाँ में
एक चिराग की तरह
रौशन होकर
अपने जिन्दगी की राहें
खुशियों से सजा लेना।
       ©अतुल कुमार यादव.

कभी कभी मैं तुमसे मिलने

थक हार कर दिल का पन्ना,
अब धीरे से सो जाता है,
अपनों की बातें नहीं हैं करता,
बस तुझमें खो जाता है,
मेरे दिल की ज्योति राशि हो,
दिल में तुम्हें जलाऊँगा,
कभी कभी मैं तुमसे मिलने,
दिल के भीतर तक आऊँगा।

रेजा रेजा दिन निकलेगा,
रेजा रेजा रातें होगी।
तुम दिल की दिल्ली में रहना,
धीरे धीरे बातें होगी।
प्रेम की डोरी में बँधकर मैं,
अपना धरम निभाऊँगा,
कभी कभी मैं तुमसे मिलने,
दिल के भीतर तक आऊँगा।

रिश्ते नाते आज जगत में,
पल भर में मिट जाते हैं,
सुनो सुनो तुम मेरी बातें,
हम जन्मों साथ निभातें है,
आज लिये चलता हूँ संग में,
दिल में तुम्हें बसाऊँगा,
कभी कभी मैं तुमसे मिलने,
दिल के भीतर तक आऊँगा।

आज मिलन की पावन बेला है,
मंगल भाव जगाता हूँ,
जियो हजारों साल जगत में,
गीत खुशी के गाता हूँ,
गीतें गाते खुशियों की मैं,
पास सभी के जाऊँगा।
कभी कभी मैं तुमसे मिलने
दिल के भीतर तक आऊँगा।

कभी कभी मैं तुमसे मिलने
दिल के भीतर तक जाऊँगा,
जब जब यादें लहरें लेंगी,
पोर पोर खुल जाऊँगा,
गीतें गातें गातें तुमसे,
चितवन में मिल जाऊँगा,
कभी कभी मैं तुमसे मिलने
दिल के भीतर तक आऊँगा।।
                   ©अतुल कुमार यादव.

ग़ज़ल : सुनाओ आज दिल की तुम


सुनाओ आज दिल की तुम तुम्हारा हाल कैसा है?
तुम्हारे लोग कैसे हैं कहो ये साल कैसा है?

नहीं जीना हमें मरना कभी अब इश्क में फँसकर,
नहीं मैं जानता कुछ भी बता दो ख्याल कैसा है?

घरौंदा हो भले छोटा निवाला तुम ग्रहण करना,
मगर मत पूछ लेना ये कि चावल दाल कैसा है?

हमें बस ख्वाब मिलता है अभी दिन के उजालों में,
निगाहों में हकीकत का भरा जंजाल कैसा है?

अदालत की बिकी झूठी गवाही दिल कुरेदीं हैं,
शहर की तब हवाओं में मचा भूचाल कैसा है?

बहर मालूम होती गर मुकम्मल हर नजर होती,
ग़ज़ल के भाष में सुन लो अभी ये लाल कैसा है?
                                    ✍© अतुल कुमार यादव

Tuesday, 7 March 2017

नये आसमाँ की तलाश

चलो...
आज एक नये आसमाँ की 
तलाश करते हैं
ख्वाहिशों के बादलों में
जिस विरानियों ने
अपना घर बना रखा है
उसे इस आजाद फिजाओं की
वादियों से अलग करके
अँधेरा छाटते हैं
भावनाओं और एहसासों के तले
एक उजला सूरज उगाते हैं
जिससे अपने चेहरे पर
फैले...
इन उदासियों को
अपने से...
दूर भगाते हैं।
उल्फत की रौशनी में
रूस्वाईयों के बादलों पर
चाहत और प्यार का
जो इन्द्रधनुष
इन पहाड़ों और झरनों ने
सजाये हैं
चलो...
उन्हें
अपने जज्बातों के
मचलते तड़पते अरमानों से
फिर से महकाते हैं।
जिन्दगी की
बनती-बिगड़ती राहें
ठीक उसी तरह से हैं
जैसे कि
इन पहाड़ों के बीच से
ये निकलती नदियाँ
या गिरते झरने।
ये हमें अक्सर बताते हैं
खामोशियों की भी
इक अपनी जुबाँ होती है
जिससे दर्द भरी यादों के
सिलसिले कभी
थमते नहीं और
अनकहे जज्बात
अपनी आवाज लिये
सब कुछ बयां करने को
सिहर उठते हैं।
इस हरियाली भरे
गुलशन की फिजाओं में
श्वेत मोतियों सी चमकती
इस धार के अतृप्त अरमानों को
अगर तुम महसूस कर सको
या फिर दिल के पन्नें को
एहसासों से भिगोती कलम
तुम्हारे मन की
खिड़कियों को खोले
ताजी हवाओं के साथ दस्तक दे
तो उसके एहसासों को
उसके अरमानों को
उसकी ख्वाहिशों को
उसके मधुरिम भावों को
तुम अपने में समेट लेना।
           ©अतुल कुमार यादव.

Monday, 6 March 2017

कब ले होई

हे भगवान!
तू सब क मालिक,
बस रात खतम होखे के बा,
फिर नया सबेरा होखे के बा,
नया उजाला फिर से होई,
हमार जिनगी भरल बा तम से,
अब बता द,
ईहा उजाला कब ले होई?
हे भगवान!
तू सब क मालिक,
तहरे कृपा त जग पर बा,
तहरे दया के सागर मे,
सब कर नाव त तैरत बा,
हमरे नाव क न पता ठिकाना,
अब बता द,
दरिया पार हमसे कब ले होई?
हे भगवान!
तू सब क मालिक,
हमार विश्वास बस तोह पर बा,
विश्वास कबो न कम होखे,
एहकर फैसला त बस तोह पर बा,
सगरो चेहरा हमके हँसत मिलल,
अब बता द,
ये चेहरा पर मुस्कान कब ले होई॥
हे भगवान!
तू सब क मालिक,
आज सगरो सवाल बस तोहसे बा,
जननी जग के बा आधार,
फिर तोहसे जुड़ल तार इ कईसे बा,
कण-कण में नाम तहरे व्यापित,
फिर बता द,
हमार उद्धार यहाँ से कब ले होई?
                      ©अतुल कुमार यादव.

नवजीवन के दीप जला कर

नवजीवन के दीप जला कर,
आशाओं के फूल खिलाकर,
रजनी के इस प्रथम पहर में,
चंदा की किरणों के संग संग,
सुरमई शाम के सांवलेपन पर,
इन आँखों को झील बना कर,
खुद ही खुद को आँक रहा हूँ,
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ।
शिलाखंडों पर बैठ कर देखों
ना जाने क्या मैं सोच रहा हूँ,
ये सतरंगी अतरंगी जीवन है,
और महकती चंदन सी रातें,
फिर भी इन रातों में बैठे बैठे,
खुद ही खुद को साध रहा हूँ,
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ|
मैं अपनी सींमा लाँघ रहा हूँ।।
पल पल की ये स्मृतियाँ मन में,
सार्थक भावों को उद्धृत करती,
ये अश्रुपूरित आँखें होकर तब,
बूँद बूँद गम दिल का हरती,
नीम के इन ठंडे झोकों से मैं,
विहगों को धीरज दे देकर ही
खुद को अब मैं आँक रहा हूँ।
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ।।
खोल कर मैं मन की खिड़की,
अब उनका चेहरा निरेख रहा हूँ,
अरमानों के पंख लगा कर के,
बस तुमको ही मैं देख रहा हूँ,
पर भीगी भीगीं ओस सी रातें,
और ये बहकी बहकी बातें हैं,
पर सच को सच में बाँध रहा हूँ।
मैं अपनी सीमा लाँघ रहा हूँ।।
                      ©अतुल कुमार यादव.

ग्राहक जागरूकता


अगर आज सबकी ज़िंदगी पर एक बार नज़र डाले तो लगता है कि ज़िंदगी "प्रधानमंत्री के काफिले" की तरह हो गयी है| सुबह जगने से लेकर रात्रि सोने तक दुनिया भर का भागना-दौड़ना और हासिल कुछ भी न होना लगा रहता है| तमाम दिक्कतों को देखते हुए कहीं ना कहीं मन भी "मनमोहन" हो जाता है| आजकल तो महंगाई और बरसात दोनों ही अमित शाह के जुमले" की तरह दस्तक दे रहीं है| ज़िंदगी के बवाल तो लगते हैं सचमुच "दिल्ली के केजरी-वबाल" हो गये| सुबह से लेकर रात तक ज़िंदगी अपनी कश्मकश में उलझी रहती है, जिसको समझना और पार पाना दोनों मुश्किल सा हो जाता है|
            अभी कल दिल्ली में बस अड्डे पर खड़ा था.. बस का इंतजार कर रहा था, बारिश ही इतनी तेज हो गयी थी कि यातायात व्यस्थ| धीरे धीरे गाड़ियाँ आगे बढ़ रही थी, मुझे भी थोड़ा जल्दी निकलना था| थोड़ी देर इंतजार के बाद एक बस आकर रूकी| मैं बस के अन्दर दाखिल हुआ, बस वैसे भी खचाखच भरी थी पर समय से पहुँचने के लिए बस में चढ़ना पड़ा| मेरे साथ-साथ और भी लोग बस में दाखिल हो गये| जैसे-तैसे तो करके बस में दाखिल हो गया पर सबसे बडी समस्या थी अब टिकट लेना की, टिकट लेने की लोगों के अन्दर बस में भी इतनी जल्दी लगी थी कि मानों बस के अन्दर में भी कोई और बस पकड़नी थी| मुझे टोल ही लेना था अत: मैं शान्त परिचालक के पास खड़ा होकर फ्लाई-वे पर बस के चलने का इंतजार करने लगा|
            बस धीरे धीरे आगे बढ़ती रही, मैं कभी बस में बैठे लोगों को देखता तो कभी परिचालक के टिकट की लेन-देन प्रक्रिया को| अचानक मेरा ध्यान परिचालक के लेन-देन पर गहरा हो गया, मैं अपनी तेज नज़रो से उसे देखने लगा| परिचालक अपने एक हाथ में टिकट और रूपयों की नोट अंगुलियों में फसाये हुये बैठा था जबकि दूसरे हाथ से टिकट को फाड़-फाड़ दे रहा था| जिस हाथ में टिकट और रुपयों की नोट नज़र आ रही थी| उसी हाथ में एक छोटी सी थैली भी लटकी हुयी नज़र आ रही थी जो सिक्कों से भरी प्रतीत हो रही थी|
              सिक्कों से भरी थैली रखने के बावजूद परिचालक महोदय यात्रियों के टिकट लेन देन की प्रक्रिया के दौरान ये कहते हुये नहीं थक रहे थे कि सिक्के नहीं है| लोग बिना किसी टिप्पणी के आगे बढ़ जाते थे| बहुत देर तक ये सब देखने के बाद मुझसे रहा नहीं गया और मैनें भी सिक्के रहने के बावजूद दस की नोट पकड़ा दिया और अपनी धीमी आवाज में बोला: अंकल! एक टोल..| परिचालक ने नोट पकड़ी और अपने पास रखी "चार की टिकट" फाड़ी साथ में पॉच रुपये की नोट टिकट के नीचे चिपकाये धीरे से पकड़ा दिये| जैस ही वोे पकड़ाये मैनें आवाज लगायी, अंकल! ये तो नौ ही मुझे वापस किये... जबकि मैं तो आपको दस दिया था..| जवाब आया "चेंज नहीं है|" मै बोला - "ठीक है फिर आप मेरे दस दीजिए मैं आपको चेंज देता हूँ..|" वो मेरे दिये हुये दस की नोट पकड़ा दिये मैं उनकी दी हुयी पॉच की नोट तुरन्त वापस करने के बाद पॉकेट से "तीन रुपये निकाला" और देने लगा | परिचालक महोदय यह देख झल्ला गये.., "बोले ये क्या है...?? टोल चार की है और तू मुझे तीन क्युँ दे रहा??" जवाब में बोला : अंकल! चेंज इससे ज्यादा मेरे पास भी नहीं है| अब परिचालक महोदय की तेज आवाज मुझ पर रौब दिखाने जैसी प्रतीत हुयी| पर बिना विचलित हुये मैं भी अपनी थोड़ी तेज आवाज में बोलने लगा| पूरी बस का ध्यान अब हम दोनों की तरफ था...| हम दोनों फिर भी अपने-अपने में लगे रहे| कुछ लोग शान्त खड़े थे और अब कुछ शान्त कराने में लग गये|
           अन्त में परिचालक महोदय को हारकर अपनी लटकी हुयी थैली में हाथ डालना पड़ा, चिल्लरों को बाहर निकालकर एक रुपये का सिक्का देना ही पड़ा| चिल्लरों की संख्या देख और लोग भी अपने एक-एक दो-दो रुपयों की गुहार लगाने लगे| परिचालक महोदय अब गुस्से से मुझे कभी-कभी देखते हुए कुछ को उनके एक-एक दो-दो वापस करने लगे| अन्त में कुछ से रुपये वापसी में मुकर गये|
            अन्तत: बस फ्लाई-वे पर आ चुकी थी, अपनी पूरी रफ्तार से सरपट दौड़ रही थी| परिचालक महोदय हमें अभी भी देख रहे थे| रूक रूक कर कुछ बोलते भी रहे| मैं सब कुछ अनसुना कर दिया| कुछ यात्री तारिफ भी कर रहे थे, तो कुछ सिक्के लेकर बस में चढ़ने का प्रण कर रहे थे| खैर जो भी हो, आपके साथ कभी ऐसा न हो इसके लिए आपसे आशा रहेगी की आप कुछ सिक्के लेकर आगे से बस में चढ़ेगें| यहाँ बात महज एक रुपये की थी, पर उस एक रुपये की किमत उस बच्चे से पुछियेगा जो कल इसी एक रुपये की वजह से न रोटी खा सका था न पानी पी सका था और अगले दिन सड़क के फुटपाथ पर हमेशा हमेशा के लिए सोया मिला था|
 ©अतुल कुमार यादव.

सोच रहा हूँ

सोच रहा हूँ बैठे बैठे,
ये कैसा गज़ब तमाशा है।
रहते कैसे लोग यहां पर,
किसी से न जिनका नाता है।।
पल दो पल में कोई कैसे,
इन रिश्तों में बध जाता है।
मौन, मौन की भाषा सुन कर,
दिल की तह तक को भाता है।।
इक अन्जाना सा वो रिश्ता,
फिर इन गीतों को गाता है।
संकल्पों की भाषा बनकर,
कैसे कैसे इतराता है।।
सोच रहा हूँ बैठे बैठे,
ये कैसा गज़ब तमाशा है।।

               ©अतुल कुमार यादव.

दिल्ली और दिवाली

कल दिल्ली पहूँचा, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से लेकर कमरे तक फैले आवरण पर कल तनिक भी ध्यान नहीं गया, पहले देखा तो सोचा ओस के कण होंगे, परन्तु आज सुबह जगा...। कॉलेज जाने की तैयारी की, तैयार होकर प्रतिदिन की तरह कॉलेज निकल लिया| आज वातावरण का आलम कुछ अलग ही था। आज से सात दिन पहले जब कॉलेज गया था तो दृष्टि बाधित नहीं हुयी थी, सब कुछ स्वच्छ और जैसा दिखना चाहिए वैसा दिख रहा था परन्तु आज सात दिन बाद वही पथ नज़र नहीं आ रहा था जिस पर हम प्रतिदिन जाया करते थे| 
अन्तत: बस स्टैंड तक पहूँचा बस में सवार हुआ और चल दिया। सब कुछ सामान्य होकर असामान्य था। जब डीएनडी पर बस ने सरपट दौड़ लगाना शुरू किया तो आँखों में कड़वाहट महसूस होने लगी और तब मेरा ध्यान अपने आस-पास फैले ओस-नुमा वातावरण पर गहरा गया| ध्यान दिया तो पाया कि ये ओस-कण, ओस कण नहीं अपितु ये दिवाली से लेकर अब छोड़े गये पटाकों के धुँए का असर है| 
अपने छोटे से जीवन काल में पहली बार वातावरण का प्रदूषण इस कदर महसूस हुआ| पहले तो मुझे लगा कि दिल्ली के कुछ हिस्सों में ही होगा परन्तु ऐसा नहीं था| आज नोएडा से दिल्ली गया, दिल्ली से नोएडा फिर किसी कार्यवश आना हुआ उसके उपरान्त नोएडा से पुन: धौलाकुआँ ए.आर.एस.डी कॉलेज गया, वहाँ से पीतमपुरा, पीतमपूरा से सुभाष प्लेस फिर सुभाष प्लेस से जनकपूरी से होते हुये नोएडा वापस| सब जगह एक से ही हालात दिखे| सब जगह वो धुँधली-धुँधली सी परत नज़र आती रही| और हाँ, आज लक्ष्मीनगर से चलकर सराय कालेखाँ जाने वाले प्रमुख राजमार्ग से अक्षरधाम दिख ही नहीं रहा था जो कि डीएनडी से भी दिखाई देता है|
जब से ये दृश्य ध्यान में आया तब से सोच रहा हूँ जब हम मनुष्यों का ये हाल है तो अन्य पशु-पक्षियों का क्या हाल होता होगा। कहाँ से आती होगी उनमें ऊर्जा इस प्रदूषण से बचने की| दोस्तों! अब कुछ न कहना है हमें, हो सके तो आप भी एक बार इस समय दिल्ली घूमिये इस दृश्य को देखिये, महसूस कीजिए और हो सके तो पर्यावरण को दूषित होने से बचाइए| हमारे एक-एक कदम साथ चलने से काफिला बन सकता हैै।
                          ©अतुल कुमार यादव.

दिल्ली नोएडा डायरेक्ट

दिल्ली नोएडा डायरेक्ट

दिल्ली नोएडा डायरेक्ट! जी हाँ, सही सुना आपने, दिल्ली नोएडा डायरेक्ट यानी डीएनडी।वैसे तो 26 अक्टूबर तक तो डीएनडी फ्लाई-वे के नाम से अपनी छटा बिखेर रही थी, जिस पर पांव रखते ही निजी और सार्वजनिक गाड़ियों से सवारी करने वाला हर शक्स बस यही सोचता था कि बस पाँच मिनट में दिल्ली, कहने का मतलब डीएनडी पर पहूँते ही एक लोकोक्ति "अब दिल्ली दूर नहीं" अनायास ही सार्थक हो जाती थी। परन्तु आज सम्भव नहीं है, अगर आप सोच रहें हैं कि आप पाँच मिनट में दिल्ली पहुँच जायेगें तो भूल जाइए साहब।
अब डीएनडी के बुरे दिन शुरू हो गए। अब तो डीएनडी का हाल नेशनल हाईवे 29 से बद्तर हो गया है। जिस राह पर चलकर आप नोएडा से दिल्ली पाँच मिनट में पहुँचते थे अब उसी राह पर आपको पाँच की जगह पचास मिनट या ऊपर भी लग सकते है, या उससे और भी ज़्यादा का समय। आज का आलम ये हो चुका है कि पुछिये मत साहब...। जो कल डीएनडी पर कार का पहिया चढ़ाने से डरते थे आज धड़ल्ले से लेकर भागते नज़र आते है। कल जो गाड़िया चालीस-साठ की रफ्तार से दौड़ती थी आज वो अस्सी नब्बे और उसके भी ऊपर भागती नज़र आती है, पर वहीं तक जहाँ तक खुला-खुला नज़र आता है। फिर आता है एक अवरोध।
अवरोध! वो भी साधारण नहीं, नदी को जैसे ही पार करेंगे वैसे ही एक जमघट नज़र आयेगा गाड़ियों का जो आपकी सरपट दौड़ती गाड़ियों का पहियाँ बाँध कर रखेगा वो भी तब तक, जब तक आप डीएनडी छोड़कर दिल्ली में प्रवेश न कर जाये।। उस जमघट के पनघट पर जब पहुँचेंगे और थोड़ा वक्त बितायेंगे तो आप यही सोचकर मन मसोस के रह जायेंगे कि "इससे जल्दी तो हम पैदल ही पहुँच जाते।" अब यह सब लगभग दस दिन देखने के बाद हर व्यक्ति कहता नज़र आ रहा है कि "यार टोल पूरी तरह से माफ नहीं करना चाहिये था कम से कम इस जाम से निजात तो थी।" 
इस जद्दो-जहद में एक बात सच यह है कि टौल जब लेते थे तब तक डीएनडी साफ सुथरा और स्वच्छ दिखता था। दिल्ली नोएडा के बीच पसरा लगभग पाँच-छ: कि.मी. का रास्ता लगता ही नहीं था कि दिल्ली नोएडा का है। अलग ही रौनक और चहल पहल थी। परन्तु जब से एमसीडी के हाथ में गया है तब से न उतनी स्वच्छता दिखती और ना ही सुन्दरता। यकीनन कुछ दिन में वो अन्य राजमार्गों की तरह साधारण मार्गों में तब्दिल हो जायेगा। चेकपोस्टें बस आपको अपने अतीत को याद दिलाती रहेंगी।
एक ज़रूरी बात, जितने भी लोग पहले ऑफिस, स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल या अन्य ज़रूरी जगहों पर समय से पहुँचने के लिए डीएनडी से जाना उचित समझते थें अब उसी नियमित समय पर पहुँचने के लिए उनको लगभग एक घंटे पहले निकलना पड़ेगा और इस समय को आप बढ़ाते ही जाईएगा, कम करने की सोच आपकी मुर्खता होगी क्योंकि ना वो गाड़ियाँ कम होंगी, और ना ही उससे गुज़रने वाले लोग। दिन प्रतिदिन ये संख्या बढ़ती रहेगी। विकास पथ पर भारत विकासशील देश है तो साहब विकास तो करेगा ही। फिर कम करने और स्थिर करने की सोच कैसे?
अच्छा चलता हूँ, नमस्कार जी! ये तो अपनी व्यक्तिगत रही। बस आप से साझा करने का मन हुआ, तो आप से जुड़ गया, मात्र जानकारी देने हेतु। हो सकता है मैं गलत होऊं। पर साहब एक बार आप भी जायज़ा लीजिए इस सफर का और कुछ साझा कीजिए इस लुभावने दृश्य का। अच्छा! फिर से नमस्कार। धन्यवाद। जय हिन्द, जय हिन्द की माटी।
                                                     ©अतुल कुमार यादव.

हमने कब है मॉगा ठेंगा

हमने कब है मॉगा ठेंगा,
जो तुमको बस प्यारा है।
डूब मरो तुम ठेंगा पीछे,
यही हमारा नारा है।
मेरे हिस्से में ना दौलत,
ना ही मान तुम्हारा है,
है अक्षर अक्षर सींचा मैनें,
कहता लहूँ हमारा है।
भले मिले ना ठेंगा मुझको,
पर गीतों को गाना है,
कलम की बस आरजू इतनी,
जग को गीत सुनाना है।
साथ नहीं जग नहीं रहेगा,
मेरे दिल ने माना है,
हमको अपने मंजिल तक तो,
खुद ही चलते जाना है।
परत लाज की नहीं उधड़ती,
यहां ना कोई शर्माता है,
जो दिल आये जैसा चाहे,
बकबक करता जाता है।
फूलो की राहों में काटें,
वही बिछाता जाता है,
अल्प ज्ञान जेहन जो रखता,
क्युँ इतराता जाता है।
नहीं चाहिये ठेंगा मुझको,
ना ही इतना प्यारा है,
ना मैं वृहद ज्ञान का ज्ञाता,
ना ही सम्भव सारा है।
पढ़ना हो तो मुझको पढ़ लो,
जो भी हाल हमारा है,
क्यों करते हो व्यर्थ समय को,
आता नहीं दुबारा है।।
                ©अतुल कुमार यादव.

नहीं कोई खता मेरी

नहीं कोई खता मेरी नहीं कोई रही गलती,
बनाकर दूरिया मुझसे सदा खुशिया रही चलती।
बड़ी तकलीफ देती है तुम्हारे साथ की यादें,
हवाओं से न पूछो रात अब कैसे रही ढलती।
सहारा वो तुम्हारा आज तक जो मिल गया होता,
किनारे ही किनारे नाव दुख की हाथ को मलती।
जरा बेचैन होती है बना लूँ जिन्दगी उसको,
हमारी याद जिसके दिल सदा खुद ही रही जलती।
मुझे जीना सिखाकर जो जुदाई दे गयी मुझको,
सिखा पाया नहीं कुछ भी यही बातें रहीं खलती।
नहीं मैं हार माना हूँ नहीं ख्वाहिश रही उसकी,
मुहब्बत दिल नहीं मेरे न वो खुद ही रही पलती।
कहीं दिखती नहीं मंजिल न कोई राह दिखती है,
अतुल तुम खुद बताओ यार कब तक साथ वो चलती।
                                            ©अतुल कुमार यादव.

हम तो उनकी नजरों पर नजर रखते हैं



हम तो उनकी नजरों पर नजर रखते हैं,
घर के गमलों में हम भी शज़र रखते हैं।
हमको क्या समझेंगे जो झुठ बोलते हैं।
हम तो सच कहने का बस हुनर रखते हैं।
उनको तो शायद ही कुछ हो ज्ञात मेरा,
पर हम हैं की उनकी हर खबर रखते हैं।
वो महफिल में बैठें शायद गमजदा हो,
पर हम तो बातों में ही अपना असर रखते हैं।
वो रखते होगें अपने जेहन में तमाशें,
पर हम दिल के शहरों में शहर रखते हैं।।
मेरी ख्वाबों की सिलवट पर कदम उनके,
हम तो उनको ही अपना सफर रखते है।।
                            ©अतुल कुमार यादव.

पैसों के रंजिश के चलते

पैसों के रंजिश के चलते,
घर को अपने जला दिया।
चावल दाल नसीब हुयी बस,
सब कुछ अपना गवां दिया।
पैसा पैसा करने वालों,
काले की हो वजह तुम्हीं।
काले पैसे रख कर तुमने,
साधारण को मुवा दिया।
गीतों में कैसे प्रीत लिखुँ,
जो अधरों पर अड़ी हुयी,
स्वर्णिम सी राहें थी पर,
तुमने काँटा बिछा दिया।
द्वार टिकाये आँखों को अब,
पैसो का पथ बाप देखता
बेटा सूरज सा तप तपकर,
चंदा को भी भूला दिया।
तुमने कैसा खेला खेला,
हालत सबकी पता करो,
नाकामी का इक आईना,
तुमने हमको थमा दिया।
करना ही था सबका करते,
अपनों का क्युँ भला किये,
काला धन सादा कर तुमने,
हम जैसो को फँसा दिया।
साहस करता जो सच बोलूँ,
कुछ कुछ तो तुम सुना करो,
प्रमुदित दिपक मन का मेरे,
जो जलता था बुझा दिया।।

कोई आता है राहों में फूलों को बिखराकर

कोई आता है राहों में फूलों को बिखराकर,
कोई गिर जाता है उन्ही फूलों से टकराकर।
सम्भाल लिया जाता है कोई महफिल में जाकर,
पर हम तो सम्भलते हैं खुद ही खुद को समझाकर।
जिनको सुलझाया हमने हरदम सच्ची बातों से,
वो चल देता हमको अपनी बातों से उलझाकर।
उम्मीदों का बांध पुलिन्दा मैं दम भर देता हूँ,
वो कॉटें भरकर राहें चलता ठेंगा दिखलाकर।
मारा मारा होकर फिरता बनकर टूटा तारा
हमको खत्म किया जैसे काम रहे निपटाकर।
सारा आँसू खारा होकर बाहर को आता है,
सादा पानी कैसे कह दूँ मैं इनको झूठलाकर।
                                     ©अतुल कुमार यादव.

Sunday, 5 March 2017

स्वागत में आज कल

स्वागत में आज कल के चढ़ रही सीढ़ियाँ,
आन बान शान बन खड़ी नयी पीढ़ियाँ।
ये लड़ लड़ थक जाती हार नहीं मानती,
हौसला लिये जिगर खड़ी नयी पीढ़ियाँ।
ठण्डी गर्मी बरसात थक जाते हारकर,
मौसमों को मात देती खड़ी नयी पीढ़ियाँ।
मंजिलें हैं दूर अभी अंधेरा जो बढ़ रहा,
पुण्ज लिये हाथ साथ खड़ी नयी पीढ़ियाँ।।
                             ©अतुल कुमार यादव.

एक रात एक बात

शब्द शब्द की पुकार एक रात एक बात।,
तात मात आज आप चॉद को सँवार दो।
आज गीत गात जात पात-पात घाट-घाट,
गाँव ठॉव हाव भाव नाव को सँवार दो।
एक एक एक बात आस पास चार धाम,
रीत प्रीत जीत मीत भ्रात को सँवार दो।
देश प्रेम डाल डाल आह वाह चाह राह,
मौन गीत फूँक प्राण गीत को सँवार दो।
                             ©अतुल कुमार यादव.

कर्ण जैसा दानवीर

कर्ण जैसा दानवीर सत्यवादी हरिश्चन्द,
अर्जून जैसे पराक्रमी आज भी पड़े है।
राम जैसा आज्ञाकारी राणा जैसा देशभक्त,
शिवाजी जैसे क्षत्रिय तो साथ में खड़े है।
श्रवण जैसा बालक एकलव्य जैसा शिष्य,
लखन जैसे भाई मेरे देश में पड़े है।
सीता जैसी नारी देखो मीरा सी दिवानी देखो,
हनुमान जैसे सेवक आज भी पड़े है।
                              ©अतुल कुमार यादव.

दिल का दिपक

दिल का दीपक जलता रहता,
चोट जिगर की सहता रहता।
गीत तराना दिल को भाता,
मुझसे हर पल कहता रहता।
दिल में है जो गम का सागर,
आँसू बन कर बहता रहता।
नफरत चाहत दिल का हिस्सा,
हसरत बन कर चलता रहता।
नजरों में अब नजरें छिपती,
सूरज भी तो ढलता रहता।
अपने दिल के हिस्सें में तो,
बस सपना ही पलता रहता।
वो क्या जानें पीर पराई,
धुन अपनी जो रमता रहता।
पल कहता है सब सहता है
सब चलता है चलता रहता।।

शब्द शब्द की पुकार

शब्द शब्द की पुकार सुन मेरी ये गुहार,
सीमाओं पे खड़े है जो उनको सलाम है।
रात रात चल रहे दिन भर जल रहे
रात रात जाग जाग कर रहे काम है।
आँधियों से लड़ जाते तुफानों से भीड़ जाते,
दुश्मनों का हर वार करते नाकाम है।।
आस कभी तोड़े नहीं साथ कभी छोड़े नहीं,
मेरे हिन्दवासियों का बस यही काम है।।
                           ©अतुल कुमार यादव.

उजाला क्या कभी ऐसे मिला होगा

चिरागों से उजाला क्या कभी ऐसे मिला होगा,
तुम्हारी याद से जैसे हमारा दिल जुड़ा होगा।
यहां जब रात होती है तुम्हारी याद आती है,
तुम्हारी याद में मूरत बना तुमने सुना होगा।
पिला कर ज़ह्र मीठा प्यार का दफना गयी मुझको,
खुदा इससे बचाये यार अच्छा ही सदा होगा।
अगर कुछ याद हो तो तुम जरा सा देख लेना घर,
तुम्हारे घर के कोने में हमारा खत पड़ा होगा।
कहो किसको सुनाये हम हमारे रंज तकलीफें,
पता है जब हमें शामिल न कोई दूसरा होगा।
तुम्हारे नाम पर जीते चले जाना वफादारी,
वफा में जान देने से भला किसका भला होगा।।
                                   ©अतुल कुमार यादव.

कभी कभी अल्फाजों में

कभी कभी अल्फाजों में,
मैं दर्द महसूसता हूँ।
कभी कभी दर्दों में ही,
अल्फाज महसूसता हूँ।
ख्वाहिशों के सभी पन्ने,
थक जाते जब बातें कर,
थम जाती सॉसें मेरी,
कुछ अल्फाजों को पाकर।
कुछ अन्जानें छूट गये,
कुछ पहचाने रूठ गये,
कुछ अपने हैं साथ चले,
कुछ अपने भी टूट गये।
मंजिल तो बस मंजिल है,
शायद खाबों की नगरी,
जज्बातों के साथ चलो,
कहती भावों की गगरी।
कुतर रहे भाव हमारे,
आँखों के सपने हरदम,
आँसू पीड़ा लाचारी,
भरते अब मुझमें दमखम।
सुकूं नहीं मिलता मुझको,
दर्द की भावना पाकर,
लफ्ज बयां होते जाते,
आँखों में अश्क भर भरकर।
लोगों का ताना बाना,
ख्यालों का आना जाना,
फिर भी सबका हाथ साथ,
रखकर है साथ निभाना।
जीवन के इस पड़ाव में,
दौर सलामत पता नहीं,
मौन मौन सी रातें है,
कब जल जाये पता नहीं।।
         ©अतुल कुमार यादव.

निराशा के जीवन में

तन, 
ह्रदय, 
मन, 
दृष्टि, 
मौन, 
क्रंदन,
धैर्य
और शाहस
बस रूप में बाधित हैं।
रात में जागती
भोर की संभावनाओं को
क्युँ भरमा रहे हो??
मेरी दृष्टि
सीमित है,
आशा-निराशा के जीवन में
हताशा-घुटन को
आवाज देकर
तन-मन को दुविधा में डाल
व्यथा को माथ लिए
अब
क्युँ सकुचा रहे हो??
मेरी आस
टिकी है
तुम पर,
मेरे प्रश्नों का
उत्तर दे दो।
दिल है
भरा
उदासियों से,
कुछ तो जरा
शिकायत दे दो।
हजारों खुशियाँ
संग में हो तो,
हँसी-खुशी सुझाव
और बस
इनायत दे दो।।
©अतुल कुमार यादव.

बुझते चिरागों की चमकीली लौ

बुझते चिरागों की,
चमकीली लौ,
वक्त बेवक्त,
मुझको,
याद आती है।
दिल हँसता है,
रोता है,
गाता है,
उन पर,
जो,
इबादत में डूबे,
पल पल हर पल,
फरियाद करते हैं।
कुछ कच्चे सपनें,
आंखों में दिनभर,
तरसते हैं,
पैरों तले दबे दर्द,
हमेशा उकसते हैं,
अन्दर की पीड़ा,
जगती है,
फिर उदास होकर,
लक्ष्य त्याग कर,
दुर्गम पथ पकड़े,
नींद की झील में,
डूबकी लगाती है।
आज कुछ लोग,
ख्वाबों में,
टहलते हैं,
गर्दिशों में रहते हैं,
फिर भी,
उनकी आँख के आँसू,
इस उम्र में,
यादों की चौखट पर,
पॉव रखे,
तकलीफों में,
उनकी हकीकत,
बयां करते हैं।
आज सारे दिल के,
दरवाजे,
लोगों की फितरत,
बताने के लिए,
मुकद्दर की रेखा,
दिखाने के लिए,
और,
खुद की दुनिया,
सजाने के लिए
खुले हैं।
हो सके तो,
आप भी,
अपने खाबों की नगरी,
हकीकत में,
सजाईये।
मुझे अपने,
जीवन के,
छिछले सागर की,
चिन्ता,
आपसे ज्यादा है,
और वही चिन्ता,
आज,
इन आँखों को,
मदहोशी में लपेटे,
सोने नहीं देती।।
©अतुल कुमार यादव.

माधव तेरी जय जयकार

मुरली तेरी करै पुकार,
माधव तेरी जय जयकार।
मधुर भाव है जिसके तन में,
प्रेम छलकता जिसके मन में,
स्वर्ग बनाया जिसने जीवन,
उसका है यह नूतन गान,
करुणामयी सुन्दर चंचल,
जगती का यह नया वितान,
आगे जिसके फिके पड़ गये,
जीवन के सारे अधिकार,
मुरली उसकी करै पुकार,
माधव तेरी जय जयकार॥
ह्रदय सदा पास ही जाता,
ऐसा है कुछ दिल का नाता,
कानन कुण्डल मणियन माला,
जलती रहती प्रेम की ज्वाला,
अन्तस के इस ह्रदय गगन में,
उन्माद बढ़ा जाता रे मन में,
जीवन को मथने की पीड़ा,
अब हर पल होती साकार,
मुरली तेरी करै पुकार,
माधव तेरी जय जयकार।
चंचल किशोर सुन्दरता का,
करता रहता हूँ रखवाली,
श्यामल शरीर कोमल पग पर,
भारी है अधरों की लाली,
जिनके चरणों में पड़कर,
इठलाती रहती हरियाली,
उस विश्व कमल के रजनी के,
मोह-माया का करै विचार,
मुरली तेरी करै पुकार,
माधव तेरी जय जयकार।
सुरभित लहरों की छाया में,
बस रही यह कैसी प्रीत,
घर से लेकर मन मंदिर तक,
गुँजते रहते है अब गीत,
भूल कर सारे दृश्यों को,
तुम्हें निखारता बारम्बार,
कैसे तुम्हारा हो जाऊँ मैं,
करता रहता बस यही विचार,
मुरली तेरी करै पुकार,
माधव तेरी जय जयकार।
चल पड़ा अब ह्रदय हमारा,
बनकर एक पथिक अशान्त,
तुमसे मिलने को हूँ व्याकुल,
फिर भी दिखता रहता शान्त,
जीवन के इस लघु सागर में,
चिर परिचित नाम घनश्याम,
शीतल-शीतल मद्धम पवनों से,
समझा दो सारा जीवन सार,
मुरली तेरी करै पुकार,
माधव तेरी जय जयकार।।
          ©अतुल कुमार यादव.

लघुकथा

मई जून का महिना था। सूरज प्रतिदिन सिर पे तेज किरणों के साथ मडराता था। जिससे गरमी इतनी बढ़ गयी थी लोगों से बरदास्त नहीं हो रही थी। हर कोई पसीने से तर-ब-तर मिलता था। काम करना भी दुश्वार हो गया था। यहां तक कि गर्मी से धरती भी परेशान हो गयी थी। बारिश के आसार दूर तक नजर नहीं आ रहे थे। जहां से देखो वही से विषैले साँप निकल रहे थे। चुहे घर में दौड़ लगाते, भागते और जो मिलता कुतरते रहते थे मानो वो भी गर्मी से बेहाल अपना गुस्सा उतार रहे हो। कुत्ते-बिल्लियाँ भी कम नहीं, घर तो छोड़िये पूरे मुहल्ले के नाक में दम कर रखा था। उस गर्मी सुविधायुक्त घरों के लोग घर में रहना ही उचित समझ रहे थे।।
कुछ दिन बाद तीन दिन तक रूक रूक बारिश होती रही। सुख रहे पेड़ पौधों में हरियाली फिर से दिखने लगी। सभी चैन की नींद सोने लगे। एक दिन गीत गाती कोयल आम की शाखा पर बैठे तोते से बोली : जब गर्मी थी तब भी इंसान घर में ही बैठा था और अब जब मौसम इतना सुहाना हो गया, फिर भी घर में ही बैठा है। क्या इतने सुहाने मौसम के मजे भी नहीं ले सकता क्या?? अमरूद की डाल पर बैठा तोता सुन कर भावुक हो गया और जवाब दिया। कोयल बहन ऐसी बात नहीं है, मानव आज हर सुविधा घर में कैद कर रखा है। वो जब चाहे तब जिस मौसम का चाहे उस मौसम के मजे ले सकता है।। फिर कोयल बोली : फिर हमारा तो दुर्भाग्य है कि हम मानव नहीं हुए। तोता जवाब दिया : नहीं, यह हमारा सौभाग्य है कि हम मानव नहीं हुए। मानव होते तो हम आज सुविधाओं के गुलाम होते। शुक्र है कि हम आजाद है। जहां चाहे जा सकते है जहां चाहे बैठ सकते है।। पर मानव नहीं। मानव को आज बाहर कपड़े खराब होने का डर, बिमार होने का डर, जाति-धर्म-मजहब आदि का डर और तरह तरह की असुविधायें नजर आती है। इतना सुनते ही कोयल बोली अच्छा हुआ जो ईश्वर ने हमें पंक्षी बनाया। आज तो मानव खुद ही खुद के नाक में दम कर रखा है।
                                             ©अतुल कुमार यादव.

चहक रहे पर उनके



चहक रहे पर उनके,​
​बहक रहे मन जिनके,​
​सुख दुख हैं पल भर के,​
​सबक सिखा छल कर के।​
​नव बहुतायत उड़ते,​
​बचपन सा सब जुड़ते,​
​पर सच को सच कहना,​
​अलग कभी मत रहना।​
​मिलकर आज डगर में,​
​खुलकर बोल शहर में,​
​अगन लगी जब लगने,​
​लगन लगी तब जगने।​
​तन मन भाव बरसते,​
​पलक किवाड़ अलसते,​
​कमर झुकाकर चलते,​
​पल पल हैं सब छलते।​
​सब कुछ पाकर जग में,​
​बिखर गया सब मग में,​
​गलत कभी मत करना,​
​'अतुल' कभी मत डरना।​
​सब जड़ चेतन वृति है,​
​सब परिवर्तन कृति है,​
​सहज सरोवर दिखती,​
​कलम समन्दर लिखती।।​
​©अतुल कुमार यादव.

बातें बनाते हैं

राज उनके जब खुले तब बातें बनाते हैं,
आज करोड़ो समेटे वो आखें दिखाते हैं।
भूख से व्याकुल परिन्दें जब लौट आते हैं
वक्त कितने भी बुरे हो आखों सुहाते हैं।
चोट पर ही चोट खाते हैं जो सदा गहरे,
दर्द क्या है सच वही तो हमको बताते हैं।
जिन्दगी के सब मजे लेते वो सियासत से,
और पल पल आज नेता हमको पढ़ाते हैं।
हम भरोसा क्या करें अब उन रहनुमाओं से,
रोग जैसे साथ चलते सच को छिपाते हैं।
कर्म पथ का हूँ मुसाफिर चलता अकेले हूँ,
कर्म से ही हम सदा उर सूरज जलाते हैं।
आ गया गर वक्त मुश्किल तुम उस घड़ी देखना,
साथ में जो हैं खड़े वो क्या क्या कराते है।।
                              ©अतुल कुमार यादव.

रौशनी है जिन्दगी के रंग में

रौशनी है जिन्दगी के रंग में,
जख्म हासिल पर सभी को जंग में|
राज अपने खुल न जाये बात में,
इसलिए वे शान्त रहते संग में|
अब सुनहरी धूप लेकर मैं चलूँ,
चाँदनी हो चाँद के जब अंग में|
मोम जैसे तुम पिघलते रात भर
लौट आओ आज अपने ढंग में|
खो गयी हैं आज सारी हरकतें,
साँस शरमाती पुलकित उमंग में|
                 ©अतुल कुमार यादव.

सूरज की किरणें

सूरज की किरणें
उन्मुक्त गगन से चलकर
जब वसुधा पर उतरती हैं
तब बातें करती हैं
धरा पर पड़े 
चमचमाती
श्वेत मोतियों से
हरे भरे गेहूँ की
छोटी छोटी पत्तियों से
और
अपने ऊष्मा का
उनमें संचार करती है
जगाती हैं
उनके अन्दर के ओज को
स्वाभिमान को
चाहती है वो भी
उसकी तरह
अपनी सुबह की आभा खोकर
उनके जैसा ही बन जाये
पर मोतियों की नमीं
किरणों को बताती है
अपने ​मनुहार​ की भाषा
और सींच देती है
किरणों को
अपने प्रेम निवेदन की भाषा से
पर किरणों के अन्दर
निहित ऊष्मा
हर दिन
अपने गर्मी के ​प्रहार​ से
गायब कर देती है
शीत रूपी मोतियों के
अभिमान को, और
गायब कर देती
उसके नमी को
साथ ही साथ
उपहार​ में छोड़ देती
सुबह की सुन्दरता
शीत का सौन्दर्य
ह्रदय की गहराई
मनुहार की भाषा
और सुबह का यौवन
जिससे सूरज सीधे
बढ़ जाता है सुबह से
दोपहर की ओर
जिसका वजूद
जिसका अस्तित्व
जिसका अहसास हमेशा ही
सुबह से कम होता है|
        ©अतुल कुमार यादव.

सोचता हूँ कुछ अल्फाज लिख दूँ

सोचता हूँ कुछ अल्फाज लिख दूँ,
मैं जीवन का हर साज लिख दूँ|
मेरे वजूद का एहसास लफ्ज़ बन,
जब सिमट जाता है तेरे नामों में,
भावों की गंगा भावूक हो बहती,
जब कागज़ कश्ती औ किनारों में,
बोलता है सूर अरमानों का जब जब
जज्बातों की ऊची उड़ान भरता है,
तब बहुत खामोश होकर बंदिशों में,
कहो तो अब अपना आज लिख दूँ,
सोचता हूँ कुछ अल्फाज लिख दूँ,
मैं जीवन का हर साज लिख दूँ,
वक्त की बीती सारी बातें भूलकर,
हसरतों के गुच्छों से खुशियाँ तोड़,
सजाऊँ हरपल मकसदी राहें अपनी
अतीत के आयामों में थोड़ा फँसकर,
अब बढ़ते चढ़ते सूरज की फितरत,
खुद को बदलने का असफल दौर,
औ जीवन की अथक बेचैनियों का,
चोटिल बोझिल एहसास लिख दूँ
तुम कहो तो सपनों उड़ान लिख दूँ,
मैं जीवन का हर साज लिख दूँ|
सफर में अपने तो हम बढ़ते ही रहे
सबको ही लेकर साथ में चलते रहे
नादानियों का सफर नादान था मैं,
खुद को ही खोकर चलता रहा मैं,
लालिमा एहसासों की साख हो जाये
महक उठे हवायें महक उठे ये दिन
ख़ाब सा ये जीवन आबाद हो जाये,
कहो तो दुआओं का साज लिख दूँ,
सोचता हूँ कुछ अल्फाज लिख दूँ,
जीवन की सच्ची परवाज लिख दूँ|।
                      ©अतुल कुमार यादव.

साथ तुम्हारे चलता हरदम

साथ तुम्हारे चलता हरदम देखो किसका साया है,
हमने गैरों को ही अक्सर साथ तुम्हारे पाया है।
अपना बनकर काम न आता जो जाना पहचाना है,
अब उसको ही तुम कहती हो अपना साथ निभाया है।
​कदम कदम पर छलिया बन के जो बस तुमको छलता है,​
अक्सर उसका ही तो नाम तुम्हारे दिल से आया है।
आज समय तो लगता है ज्यादा हर बात परखने में ,
उसमें इतना क्या है ऐसा जो बस तुमको भाया है।
रिक्तिम सी चलती राहों का अब हर रिश्ता रौशन है,
भावों की बहती इस गंगा में जो आज समाया है।।
                                        ©अतुल कुमार यादव.

बन्धन सारे तोड़ दे

अब रिस्ता रखना छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे|
मखमली सपनों की दुनिया,
तू जिसे छुपाकर है रखी,
उसी दुनिया में देख रहा,
मैं सपनों सी ये जिन्दगी,
सपनों की डोरी तोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे|
सारी खुशी तो बिखर गयी,
याद बचपन की निखर गयी,
साथ तू हरदम साथ चली,
पर कदम कदम पर है छली,
चल जीवन राहें मोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे|
मैं दण्ड भुजों पर हूँ टिका,
अपनो के लिए न हूँ बिका,
ये जब कभी भी पुष्प खिला,
सुख अपनों से ही है मिला,
अब मेरी बाहें छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे|
अब उपवन भी न दिखे हरा,
जग नश्वर मिथ्या से भरा,
बंजर धरती से ह्रदय में,
ना जाने क्या क्या है पला,
घातों का पलना तोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे|
भोर में ही उदित शाम है,
गहन निशा तेरे नाम है,
"अतुल" तम से तमतमा रहा,
औ सकल प्रकाशित रवि करे,
तब दीपक लिखना छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे|
अब रिस्ता रखना छोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे,
चल बन्धन सारे तोड़ दे,
अब रिस्ता रखना छोड़ दे||
            ©अतुल कुमार यादव.

पंख सपनों को अपने

फूलों' से अपनी राहें सजा दीजिए
पंख सपनों को अपने लगा दीजिए।
वेदना दिल में ऐसी उठी कौन सी,
हाल अपने तो दिल का बता दीजिए।
एहसासों की डोरी न टूटे कभी,
प्रेम का प्यारा दीपक जला दीजिए।
शक्सियत सबकी बाहर निकल आयगी,
गीत प्यारा कोई गुनगुना दीजिए।
जिन्दगी अपनी पावन धरा हो गयी,
प्रेम की कोई गंगा बहा दीजिए।
वक्त कटता है पढ़कर किताबें यहां,
गैर की दुनिया दिल से हटा दीजिये।
प्यार करती है दुनिया बड़े प्यार से,
प्यार से अपनी नफरत दिखा दीजिए।।
                     ©अतुल कुमार यादव.

इम्तिहान

इम्तिहान
सबेरे सबेरे के बेला में आज ना जाने काहे नीलमवाँ के आँख तनिक जल्दी से खुल गईल, रोज त उ सात बजे जागत रहे लेकिन आज चारे बजे जाग गईल। उ फेरो सुतल चाहत रहे लेकिन नींद ना अईला से ना सुतल। बिस्तरा से उठ के सीधे बाबू जी के कमरा के गईल जाके देखल त बाबू जी सूतल रहलन लेकिन नींद में ना रहलन, काहे से कि उनकरों आँख अभी खुलल रहल। नीलमवा देख के ई सब थोड़ी सोच मे पड़ गईल। फिर बिना कुछ विचार के आवाज लगा दिहल – “बाबू जी, अभी आप जागल बाड़ी, आपके नींद ना आवत बा का?” ना बेटा अईसन कुछ ना बा, बस अभिये नींद खुल गईल ह लेकिन आज बेटा तू एतना जल्दी कईसे उठ गईला ह- बाबू जी भी नीलमवाँ से जवाब आ सवाल कर दिहलन।
नीलमवा बाबू जी के सवाल के जवाब तुरन्त दे देहलस – “बाबू जी! अब हमार परीक्षा आवे वाला बा जेवना से नींद ना आवत बा” एतने बोलत बोलत नीलमवा बाबू जी के कमरा में भजन के कैसेट चला दिहल “रघुपति राघव राजा राम, कबीर अमृत बानी… क्रम से शुरु हो गईल, नीलमवा फिर अपने कमरा में जाके अपन बिखरल किताब समेट के रख दिहल फिर जाके रसोई में चाय बनावे लागल। चाय बनला के बाद घर में जे जे जागल रहल सबका खाट तक पहुँचा दिहलस। ईधर फिर जब बाबू जी के कमरा में चाय ले के पहुँचल त देखल कि अभी भी बाबू जी खाट पर लेटल आँख खोल के कुछ सोचला में लागल हवन..। ए बेर देख के नीलमवा के मन अधीर हो गईल। चाय बाबू जी पकड़ा के अपना कमरा में दौड़ के भाग आईल..।आके तुरन्त दिवार पर टगल अपने मरल माई के फोटो उतार के सीना से लगा के सिसके लागल।
आज नीलमवा बार बार सोचत रहल, काश माई आज तू रहतू त आज एह टाईम बाबू जी के आँख अईसे ना खुलल रहत। पता ना कब फिर रोवत रोवत निलमवाँ सुत गईल..। जागल त सूरज देवता कपार पर नजर आवत रहलन, बाबू जी अपना काम पर जा चुकल रहलन, भैया भी अपना काँलेज के निकल गईल रहलन। घर के बाकी सदस्य भी अपना अपना काम में मसगूल रहले। इम्तिहान आवे वाला रहल एह से इम्तिहान के तैयारी के वास्ते नीलमवा के स्कूल बन्द रहल। थोड़ी देर बाद जब फिर नीलमवा अपने कमरा में पहुँचल त माई के फोटो बिस्तरा पर देख के फिर से अधीर हो गईल… बहूत देर ले माई के याद में गुम रहल… रह रह के पहिले के हर बात माई के याद आवत रहल, पर का करो अब वो याद के, बस याद ही त आ सकत रहे माई त ना न। मन मार के मायूस पूरे दिन रहल कबो कबो आँख से आँसू भी चेहरा पर आवत जात दिखाइ देहलस।
इधर बाबू जी आज नीलमवा के भविष्य के लेके बहूत परेशान रहलन। कहल जाला कि मेड़ के टूटल, हवा के रूठल, पहाड़ के जलल, नदी के चलल, मोर के नाचल, शेर के दहाड़ल, महुआ के गिरल, बादल के बरसल, सरसो क हरसल अऊर बागीन के चहकला क एगो सही समय होला। आज कुछ एईसने चिन्ता बाबू जी के नीलमवा के हो गईल। नीलमवा अपने जिला के दसवीं के टाँपर लड़की रहल। जेहता पढ़ला में अऊवल ओतना संस्कार में भी। आज बारहवीं के पेपर ओकरा कपार पर रहल, ओकरा के अपना भविष्य के तनको चिन्ता ना रहल जेतना बाबूँ जी के रहल। बाबू जी अब ओकर शादी कर देहल चाहत रहलन जबकि नीलमवाँ के आँख मे आगे पढ़ला अऊर बढ़ला के ढेर सपना पलत रहल।
बाबू जी एक दिन घर में सबका के पास बुला के नीलमवा के शादी के खबर देहलन। नीलमवा चाह के भी बाबू जी के ओह फैसला के बदलवा न पऊलस। इधर उ पेपर के तैयारी में लागल त दूसरी तरफ घर वाला लोग ओकरा के शादी के तैयारी में। फिलहाल परीक्षा के समय आ गईल, मात्र एक दिन शेष बाचल रहल, तब नीम के पेड़ के नीचे गाँव के पढ़े वाला युवा लोगन के खाट सज गईल, बिछौना लग गईल, नीम के पेड़ के नीचे एह लिये कि केहूँ आज के रात सूत्ती ना, अगर सुत्ती महुये जस टपकत निबकौड़ी जगावत रही । कुछ लोग ना आईल रहले नीम के पेड़ के नीचे, उन्हनी लोगन के लाल्टेन अऊर ढिबरी घर में जलत पुरी रात दिखत रहे। इधर नीलमवाँ आज छत पर बिस्तरा डाल के चाँदनी रात में चाँद में माई के चेहरा आ अऊर तरईयन में माई के दुआ देखत रहल। कबो कबो बड़बड़ात भी रहे कि माई इ जेतना तरई लौकत हवे ना ओतने नम्बर आई। धीरे धीरे क के सारा पेपर खत्म हो गईल। अब बस परिणाम के सबका इंतजार रहल।
घर में सब अपना अपना काम में लागल रहे। २५ जुन के शादी के तारीख पक्का हो गईल। लईका पी०सी०एस० में हेड कांस्टेबल। खबर दे दीहल गईल बिना केहूँ से मर्जी पुछले। २५ जून के परीक्षा-परिणाम के तारिख घोषित कर दिहल गईल। अब नीलमवा परीक्षा परिणाम और शादी के शहनाई के शोर सोच सोच के कबो कबो बेकला के खड़ा हो जात रहे त कबो कबो सिर से पाव ले झटक देत रहल। ओकरा अन्दर आज कल बहूत कुछ टूट-फूट मचल रहल पर केहु से कह ना सकत रहे। सरसो के पियरी नाई ओकरा चेहरा पियरा गईल रहे। एतना ज्यादा तनाव महसूस करत रहल कि दिन दुपहरिया में ही खामोशी के चादर तान के दलान के खाट पर सुत जात रहल।
धीरे धीरे आज २५ जून आ गईल। सबेरे अखबार कहर ढावत नीलमवा के दरवाजे आ गईल, लेकिन शादी के आगे केहूँ अखबार ना देख पऊलस। चारो ओर ढोल नगाड़ा के आवाज सुनात रहे बस नीलमवा के गाँव छोड़ के। तबले अखबार के टुकड़ा लिहले गौरव भैया आ पहुँचलन, नीलमवाँ के गाँव के पहिला और आखिरी आई ई ऎस। अरे चचा प्रणाम, हमार छोटकी बहिन नीलमवा कहा बे…। गौरव भैया नीलमवा के बहुत करीब रहलन.. जब कवनो भी दिक्कत होखे नीलमवा के साथ खड़ा रहन। बारहवीं के पुरा गणित लगभग लगभग उहे त सिखईले रहलन। अभी चचा कुछ बोलही के रहलन की गौरव बाबू चचा के पकड़ के नीलमवा के सामने छोटकी छोटकी के आवाज लगावत पहुँच गईले। नीलमवाँ गौरव के देखते बोलल अरे भैया आप.. कब अईलीं घरे नौकरी से…। गौरव बाबू – “अरे चुप, ई सब बाद में, ले हई पेपर देख और बोल तोके आज का चाही आज देबे के तैयार बानी। एतने में बाबू जी ओर मुह घुमा के “चचा आज फिर से निलमवा टाँप क गईल हो गाँव जवार”। एतना सुनते बाबू जी के आँख में आँसू आ गईल। त दुसरी ओर निलमवा गौरव के पकड़ के भैया भैया के साथे आज पहिली बार माई माई कह के बाबू के सामने रोवे लागल। आज नीलमवा एगो अऊर परीक्षा जीवन के पास क लिहलस।
लेकिन दूसरी ओर दुर्भाग्य रहल की एकहू लईका पास न भईलनस ओ गाँव के। पुरा गाँव आज गाली देत रहल लईका समुदाय के, त केहु “इ ससूरा कुल पढ़त लिखत ना हवन स खाली हमनी के पढ़ावत हवन स” कहने से थक नही रहा। शाम होत होत माहोल गाँव के बदल गईल, पुरा गाँव नीलमवाँ की शादी में आवे खातिर तैयार दिखत रहल, खुशी भी आज त दुगुनी जे हो गईल रहे। उतावलापन अऊर खुशी एतना ज्यादा बढ़ गईल रहे कि लईका कुल अपना में कहे स “अऊर हो रजा! चला आज दू दू गो खुशी के लड्डू खा आवल जा।
नीलम के घर के माहौल त शाम के समय गजब हो गईल, जब बारात दुआर पर पहुँचल। केहू चना के दाल, केहू अरहर के दाल, केहू रोटी केहू पुड़ी केहू चावल केहू सब्जी केहू सलाद केहू पानी त केहू कुछ लिहले दौड़त बारातियन के पंक्ति में नजर आईल। आखिर ओह दिन नीलमवा के ना चाहते हुये भी शादी कर दिहल गईल। नीलम के सपना के उड़ान ओ दिन बन्द हो गईल जेवना दिन नीलम के पति निहाल बाबू पढा़ई खातिर मना कर दिहले। शादी के तीन साल तीन महिना बाद नीलम के हँसी खुशी जिनगी में भूचाल आ गईल। भूचाल एह लिये कि निहाल बाबू के नौकरी से तबादला के पेपर सरकार से मिल गईल अऊर नौकरी के एह बदलाव में निहाल बाबू के दुर्घटना हो गईल अऊर जवन ना होखे के तवने हो गईल। चाह के भी निहाल बाबू बच ना पवले। कुछ दिन त नीलमवा के हाल ठीक ठाक रहल लेकिन कुछ दिन बाद ज्यादा खराब होखे लागल त ससुराल वाले मायके लाकर पहुँचा गये। एकहू बच्चा न रहला से नीलम के दूसरी शादी के आजादी दे दीहलें ससूराल वाले पर नीलमवा के दुसरा के नाम के सिन्दूर माँग में भरल अच्छा ना लागल।
नीलम के जिनगी वैसे त हमेशा माई के साया के बिन दुख मे ही बीतत रहल पर वापस मायके में छोड़ला के दुख, निहाल बाबू के याद दिन-ब-दिन खाये लागल। सरकार इधर पेपर निहाल बाबू के घर भेज देहलस नीलम के नौकरी के। नीलम के ससूराल वाले फिर मायके से उठा ले गये ससुराल। साहब लालच बहुत कुछ करा देला। ससुराल पहुच के जब नीलम पेपर देखलस त अपना ससूर जी से बोलल- “बाबू जी ई हे नोकरिया हमार सुख चैन आ राउर बेटा छिन लेहलस फेर काहे हमका ओही में भेजत हईं, हम नौकरी ना कयल चाहत तानी, नौकरी नहिये करें खातिर उहाँ के त हमार पढ़ाई छुड़वा दिहनी न” बात सुनकर ससूर जी के आँख में आँसू आ गईल। आँसू पोछत ससुर जी घर से बहरा निकल गईलीं। फिर कबों नौकरी के नीलम के ना कहले।
पर, घर के अऊर सदस्य के कहला पर नीलम नौकरी ज्वाईन कर लेहलस। एक दिन सबेरे सबेरे बहूत खुश होके नौकरी पर निकलल, पता ना काहे बहुत खुश रहल शायद निहाल के लागत रहल फेरो सपना में देखले रहल, सबेरे सबेरे ससुर के पाव छुवलस सास के पाव छुवलस, खुशी खुशी घर के बहरा पाव रखलस, धीरे धीरे वो दिन मुस्कुरात भी रहल तब सास ई सब देख के बोल दिहली- “नीलम बेटा! आज तू मुस्कुरात घरी बहूत अच्छा लागत हऊ” तबहीये नीलम बोल दिहलस - “का माँ आपे न कहेली की घर से केहूँ बहरा निकले त टोके के ना चाही, अब बताई आज निहाल बाबू मिले के बोलईली ह अऊर आप टोक लगा दिहली”। निहाल के माँई के आँख भर गईल अऊर हाथ दुआ के ऊपर उठ गईल नीलमवा के ओर, दिल से आवाज निकलल- “नीलम बेटा! काश आज तोहसे मिले खातिर हमार बेटा जिन्दा रहत”। एतने बोलते बोलते माई बेशुध होके उहवे गिर गईली। एने नीलमवा कार्यालय पहुँच के कुर्सी पर बैईठल निहाल बाबू अऊर माँ के यादों में खो गईल। अचानक ओकरा दिल के धड़कने बढ़ गईल, जब तक केहूँ कुछ करत या कहीं ले जा पावत तब तक नीलम जमीं पर सुत गईल। चल गईल निहाल बाबू अऊर अपने माई से मिले। छोड़ देहलस ई धरती ई जहान हमेशा हमेशा खातिर। हमेशा टाँप करे वाली नीलमवाँ आज तक ले जिनगी के पढ़ाई मन से पढ़ले रहल, कबो फेल ना भईल रहे, लेकिन जिनगी के परीक्षा में आज इम्तेहान शुरू भईला से पहिले ही फेल हो गईल।
©अतुल कुमार यादव.

हे ईश्वर! हे अल्ला! हे दाता!

हे ईश्वर! हे अल्ला! हे दाता!
तुम ही हो मेरे भाग्य-विधाता।
कृपा तुम्हारी जब हम पर होती,
तब सारी दुनियाँ अपनी होती,
नहीं किसी से डर है होता,
नहीं किसी से भय है होता,
होती जब दया दृष्टि की छाया,
खुद को सदा निडर मैं पाता,
हे ईश्वर! हे अल्ला! हे दाता!
तुम ही हो मेरे भाग्य-विधाता!
जीवन है सुख दुख का गागर,
पर तुम हो करुणा का सागर,
सब जन को रास हो आते,
सबके मन को हो तुम भाते,
क्या करूँ तेरा व्याख्याना,
मेरे तो कुछ समझ ना आता।
हे ईश्वर! हे अल्ला! हे दाता!
तुम ही हो मेरे भाग्य-विधाता।
तुम दीनों के हो सुखदाता,
तुम हो उनके भाग्य-विधाता,
तुम्हीं तो हो सृष्टि निर्माता,
तुम हो आदि अन्त के ज्ञाता,
जो तुमको मन भीतर पाता,
वो ही सदा मोक्ष को जाता,
हे ईश्वर! हे अल्ला! हे दाता!
तुम ही हो मेरे भाग्य-विधाता।
दूर करो दुख दर्द हमारे,
हे खुशियों के अमृतदाता,
सब कुछ तो है दिया आपका,
क्या भेंट करूँ मैं रिश्ता नाता,
अपनी कृपा बनाये रखना,
हरदम तुमको ही मैं ध्याता,
हे ईश्वर! हे अल्ला! हे दाता!
तुम ही हो मेरे भाग्य-विधाता।
           ©अतुल कुमार यादव.

राह में फूल कोई खिला दीजिए

राह में फूल कोई खिला दीजिए,
सो गयी चेतना को जगा दीजिए।
एक भौंरा बना मैं सदा ही रहा,
प्रेम का एक दीपक जला दीजिए।
ख्वाहिशें रो रही हैं धरा पर कहीं,
लफ्ज में ख़्वाब सारे दिखा दीजिए।
जो उदासी भरें चेहरे हैं यहां,
उन लबों पे हँसी का मजा दीजिए।
जख्म दिल में लिए हम चले रात दिन,
चोट देकर मुझे मुस्कुरा दीजिए।
शक्सियत झूठ की गर छिपानी रहीं,
लाख इल्जाम मुझ पर लगा दीजिए।
ऐ सनम तू बता दे खता प्यार की,
बाद सूली पे' हमको चढ़ा दीजिए ।।
                      ©अतुल कुमार यादव.

कोशिश मत करना

हमको पाने की कोशिश मत करना,
अब अपनाने की कोशिश मत करना।
मैं खुद उलझा हूँ अपनी उलझन में,
तुम सुलझानें की कोशिश मत करना।
हमने दिन में जो तारे तोड़े थे,
चॉद बताने की कोशिश मत करना।
साया बन सूरज साथ रहे न रहे,
यूँ चमकाने की कोशिश मत करना।
कोई भी मंजिल अब आसान नहीं है,
पर भटकाने की कोशिश मत करना।
मालूम नहीं आगे का रास्ता अब,
बस बहकाने की कोशिश मत करना।
राहें "अतुल" भरी है कंकड़ पत्थर से,
काँट बिछाने की कोशिश मत करना।।
                           ©अतुल कुमार यादव.

तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ

तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे प्यार का किस्सा,
हमें मशगूल कर देता,
तुम्हारे प्यार में फँसकर,
मैं अक्सर भूल कर देता,
नहीं अब भूल करनी है,
नहीं मशगुल है होना,
हमें तो चाँद बनना था,
धरा के साथ रहना था,
मगर सूरज बना दी तुम,
जलन अब छोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।१
कहा पहले बहुत तुमसे,
मेरे से दूर ही रहना,
अदाओं पर नहीं मरता,
यही तो था मेरा कहना,
तुम्हारे बिन नहीं लगता,
कहीं पर अब हमारा दिल,
तुम्हें अब संग में लेकर,
गुजरना है बड़ा मुश्किल,
लिये इन्हीं विचारों को,
जिगर मैं तोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।२
जमाना जानता ये भी,
सियासत प्रेम में पलती,
निकलना है तेरे दिल से,
मगर यादें बहुत छलती,
नहीं कोई जगह तेरी,
नहीं कोई जगह मेरी,
लुटा हर बार है ये दिल,
तुम्हारे दिल कि बस्ती में,
न आना लौटकर अब तुम
मुहब्बत छोड़ बैठा हूँ।
तुम्हारे इस जमाने से मैं अब मुह मोड़ बैठा हूँ,
तुम्हारे ही लिए सब कुछ तो मैं अब छोड़ बैठा हूँ।३
                                            ©अतुल कुमार यादव.

मैं खुश हूँ।

अमन चैन की रातों में अब
अहसासों की मोती लिए मैं
शब्दों का आकाश पिरोता हूँ
कभी-कभी ह्रदय को 
शब्दों की कोमल पंखुरियाँ 
घायल कर देती हैं
और उस व्यथा की कथा
मन की लहरों से टकराकर
ह्रदय पटल पर छप जाती है
आज उसी पृष्ट भूमि पर
शब्दों के दीप जलते बुझते हैं
और आज उसकी आभा में
अपनी चमक लिए मैं खुश हूँ,
जी हाँ
मैं खुश हूँ।​
       ©अतुल कुमार यादव.