Saturday, 10 June 2017

कहानी : राह क फूल

            गंगा मईया के लहर उफान पर रहे, पानी एकदम ठंडा गईल रहे अउर ठंडायें भी काहे न? जब सूरज क चार दिन से पते ना रहे ऊपर से ठंडी के मौसम। सगरो सड़क विरान नजर आवत रहे। गंगा मईया भी धीरे धीरे किनारे की ओर बढ़त आवत रहलीं। लोगन के आवा-जाही ठप रहे। सब अपना-अपना घर में छुप के बइठल-सुतल रहे। अउर अईसना मौसम में एगो झाड़ी के पीछे से कुछ हलचल अउर आवाज आवत रहे। कुछ महिन स्वर सुनाई पड़ल- 'रेखा हमनी के कबले अईसे छुप छुप के मिलत रहल जाई? कबले इ समाज हमनी के स्वीकार करी?' रेखा बोल उठल : 'रोहन एहगने मत बोलs, हिम्मत राखs सब ठीक हो जाई, समाज बदले ना बदल जाला।' रोहन सुन के बोल उठल :' अरे ना रे रेखा! हम अउर इंतजार नईखी कर सकत। ई हमार समाज हमरा जीयल नईखे देहल चाहत। ई रूढ़िवादी परम्परा देखत हई ना? ऊपर से ई हाथ पॉव में पड़ल जाति-पाति छुआ-छूत के बेमारी, समाज के कोढ़। रेखा हमनी के ई जीये ना दी रे समाज।' एतना कहत कहत रोहन के आँख भर गईल, आँख से आँसू निकल के गाल पर ढरक गईल। 
              रेखा देख के इ सब भावूक हो गईल कुछ बोल ना पावत रहे। बड़ी हिम्मत कके रोहन के हाथ पकड़ के सीना पर लगा लेहलस अऊर बोल पड़ल : 'रोहन! जवन चाहत हव न तू उहे होई। ई समाज हमनी के कबो ना अलग कर सकेला। लेकिन तू कहीं एह समाज के डर से हमरा के मँझधार में तs ना न छोड़ देबs। एतना बोलत-बोलत रेखा रोहन के गले से लगा लिहलस अउर सिसक सिसक के रोवे लागल। रोहन रेखा के बाल सहला के बोलल पड़ल.. अरे रो मत पगली हम तोरा बहुत प्यार करेलीं। तू गंगा मईया के पानी लेखा एकदम पवित्र बाड़ी। तोरा के हम कबो मझधार में ना छोड़ सकी ले।
               लेकिन साहब समाज लोगन से बड़ से बड़ पाप करवा देला, लोगन के हौसला तोड़ देला, बड़ बड़ लोगन के एक दूसरा से अलगा कर देला। रेखा के एह बात के डर दिल में लागल रहे, धीरे धीरे गंगा मईया के पानी की ओर कदम बढ़े लागल, रेखा एक ओर डेग डाले त दूसरी ओर बहुत कुछ सोचत रहे: कहीं रोहन भी सब पाप कईला के बाद "राह क फूल" बना के छोड़ त ना दिहीं, एह से सोचत सोचत बोल पड़ल, ऐ रोहन! कहीं हमरा के "राह क फूल" बना के छोड तs...। रेखा एतने बोलल रहे कि रोहन मुँह पे हाथ रख देहलस। रेखा के फिर से गले लगा लेहलस। फिर गंगा मईया के पानी हाथ से उठा के रेखा के हाथ में रख देहलस। हाथ में पानी राख के बोलल "रेखा! गंगा मईया के पानी क कीरिया! चाहे जान चल जाई पर तोर साथ कबो छोड़ ना सकेली। एह बात के हम कसम उठावत बानी।' धीरे धीरे बोलत बतियावत रेखा रोहन गंगा मईया के किनारा छोड़ गॉव के किनारे आ गईले। फिर दूनो अलग अलग दिशा में अपना घरे के चल दिहलें।
                समय क पहिय दिन रात चलत रहे। रोहन के सपना आज साकार हो गईल। रोहन के बी.ए. कईला के बाद लेफ्टिनेंट के ट्रेनिंग देबे बदे देहरादून जाये के कागज आ गईल। पूरा गॉव मोहल्ला खुश, रोहन पूरा गॉव के बेटा हो गईल। धीरे-धीरे समय बीतल अऊर रोहन के जाये के समय आ गईल। पूरा गॉव ढोल के थाप पर थिरकत चल देहलस रोहन के पीछे-पीछे रास्ता धरावे। सब लोग हँस खिलत रहे पर आज एह खुशी के बेला में एगो चेहरा खामोश नजर आवत रहे। उ चेहरा रहल रेखा के। रोहन के निगाह रेखा पर पड़ल त रोहन से रह ना गईल। दउड़ के जाके रेखा के सामने खड़ा होईल..। ठुट्टी पर हाथ लगाके रेखा के चेहरा ऊपर उठावल त रेखा के आँख में आँसू देख के सन्न रह गईल। लागल कि रोहन के कलेजा फट गईल। बहुत हिम्मत कके रोहन बोलल "रोवत का हई पगली! ट्रेनिंग पूरा क के जल्दिये आ जाईब। फिर धूम धाम से शहनाई बजी शादी कईल जाई।" फिर रेखा के रोहन गले लगईलस फिर सामने खड़ी गाड़ी की तरफ चल देहलस। गाड़ी में बईठला के बाद रेखा की तरफ रोहन देखलस त रेखा के आँख ओकरा के ही देखत रहे। अचानक रेखा बोल पड़ल : "हम तहरे प्यार......।" तबही गाड़ी चल देहलस अउर रेखा के आवाज उहें दब गईल। रोहन भी गाड़ी में बईठल में सोच पड़ गईल कि रेखा आखिर कहल का चाहत रहे। "हम तहरे प्यार..." आगे का हो सकेला?? सोचत सोचत रोहन के नींद लाग गईल। 
अगले दिन सूरज के रोशनी रोहन के ऊपर पड़ल। कुछ गर्मी के अहसास भईल त रोहन के नींद खुल गईल। देखले त गाड़ी सरपट भागत जा रहे। अचानक फिर रेखा के याद आ गईल फिर उहे सवाल दिमाग में आ गईल जवना सवाल के साथ रोहन के नींद लाग गईल रहे। अचानक रोहन के दिमाग में आईल कि कहीं रेखा के प्यार मतलब त ई ना कि उ हमारा बच्चा के माँ बने वाली बिया। नाहीं अईसन ना हो सकेला। खैर बहुत कुछ दिमाग में चलला के बाद रोहन के दिमाग से उ सवाल गायब हो गईल।
            धीरे धीरे समय बितल। रोहन अपना परिवेश में ढल गईले। साथियन के साथे समय बीते लागल, रेखा के याद भी अब उनका तड़पावल कम कर देहलस। इधर रेखा के हाल बुरा होत गईल। रोहन के ना रहला से रेखा बहुत परेशान रहे लागल। घर वालन से रह ना गईल त रेखा से पूछे लगलन कि भईल का बा। एक दिन अपना माई से रेखा सब कुछ कुछ बता देहलस। माई जाके बाबू जी से कह देहली कि रेखा रोहन से प्यार करेले अउर ओकरा बच्चा के माँ बने वाली बिया। रेखा के बाप सुन के बेहोश होके जमीन पर गिर पड़ले। आखिर कुछ दिन बाद रेखा भी रोहन के बच्चा के माँ बन गईल। 
            इधर धीरे धीरे कुछ दिन बाद रोहन के ट्रेनिंग खत्म हो गईल। ट्रेनिंग खत्म भईला के बाद रोहन घरे आ गईल। अवते आवत रोहन के पापा रोहन के शादी के प्रस्ताव रख देहलीं। रोहन मना कर देहलस। पिता जी के पूछला पर रोहन बता देहलस कि उ रेखा से प्यार करेला और उ रेखा से ट्रेनिंग देबे गईला से पहिलहीं गॉव के मन्दिर में शादी कर लेले बे। एह बात के जानकारी रोहन के पापा के बर्दास ना भईल। गस्त खाके जमीन पर गिर पड़ले। दिल के दौरा पड़ गईल। बहुत परेशान भईला के बाद हालत सुधार भईल। तबहिं डाकिया एगो डाक लेहले रोहन के घरे दाखिल हो गईल। रोहन लेहलस अउर देखलस त पता लागल लड़ाई लागल बे एहसे ओके तुरन्त नौकरी ज्वाईन करे के पड़ी। रोहन तुरन्त तैयार भईल, पापा के पॉव छुअलस अउर निकल गईल। गाँव से निकलते रेखा याद आ गईल। रोहन रेखा के घर की ओर पॉव बढ़ा देहले। पहूँचले पर रोहन के अपना पापा बनले क जानकारी मिलल। बहुत खुश भईले, कुछ देर ठहरला के बाद रोहन रेखा के हाथ अपने हाथ में लिहलस फिर गले लगउलस बेटा के माथे पर चुम्बन अंकित कईलस अउर फिर निकल गईल लड़ाई लड़े बदे। जब रोहन जाये के बात रेखा से बतलस त रेखा ओ दिन फिर से रोवे लागल, बोल पड़ल रोहन से हमारा सोहाग के मत छिनी। पर रोहन रेखा के एक न सुनलस। कोमल गाल के पंखड़ी पर आँख से पानी लगातार ढरकत रहे। पर अपना कर्तव्य के प्रति संकल्पित भईला के कारन रोहन खुद के रोक न पऊलस अउर मातृभुमि के रक्षा बदे निकल गईल।
           पहूँचतही रोहन देखलस कि युद्ध बहुत विकराल स्थिति में पहूँच गईल रहे। नजारा देखतहीं कुछ सोचे के ना पड़ल सब कुछ समझ में आ गईल। दू दू चौकी के प्रतिनिधित्व के जिम्मेदारी अपना कंधा पर देख मुस्तैदी लड़े लागल। मुस्तैदी से लड़त लड़त रोहन से चुक हो गईल। दू गो गोली सनसनात रोहन के देह मे दाखिल हो गईल। एगो कंधा के छेदत आर-पार निकल गईल। दूसरी सीना मे धँस गईल। फिर भी हिम्मत ना हारल रोहन। जबले साहस रहल तबले लड़त रहल। जब ना साहस रह गईल तब जमीन पर गिरे लागल । गिरला से पहिले बोल उठल! साथी लोग अब मातृभुमि के रक्षा करिह जा। जय हिन्द बोल के रोहन वीरगति प्राप्त कर लीहलस।
          कुछ दिन बाद युद्ध समाप्त भईल। रेड क्रास सोसाईटी वाला लोग लाश उठावल, घायल लोग के दवा उपचार करवावल, शहीद लोग के घर खबर भेजला के जिम्मेदारी करे लागल लोग। एक दिन एगो डाक फिर डाकिया लेके रोहन के बाबू जी के पास पहूँचल। जवना में संवेदना अउर रोहन के वीरता के उल्लेख रहल। संवेदना के समाचार पढ़ला के बाद रोहन के बाबूजी काठ बन गईले। कुछ देर बाद जब चेतना से जगले त बेटा के मरला के गहरा दुख झेले के हिम्मत अपना में भरले। बहादूर बेटा के बाप आज बेटा के बहादुरी अउर सम्मान के मउत क संतोष लेके जीये लगले। मरला के बाद रोहन के मरमोपरान्त महावीर चक्र से सम्मानित कईल गईल।
          इधर रेखा क सुहाग लुट चुकल रहे। एह बेला में रेखा अकेल और निसहाय हो चुकल रहे। अपना के कोष-कोष के, रो-रो केआपन बुरा हाल कर लेहलस। रोवत रोवत बस एतने कह पावत रहल : 'रोहन! सच में आज हमरा के उ " राह क फूल" बना देहल जवना के आज केहूँये मसल सकेला आ फेंक सकेला। तबहीये रोहन के आज रेखा के घर के दहलीज पर कदम रख देहले अउर बोल पड़ले : 'ना रेखा बिटिया तू "राह के फूल" ना हमरा हमरा घर के बहू बाड़ी, हमरा घर के इज्जत बाड़ी। तोरा के केहूँ मसल नईखें सकते ना ही तोरा के केहूँ फेंक सकेला। चल बेटा अब अपना घरे चल। रेखा अपना बच्चा के लेहले आज रोहन के घर में दाखिल हो गईल। रोहन के पापा के आज आँख खुल गईल रहे, समाज के रूढ़िवादी परम्परा अऊर अंधविश्वास से रोहन पिता जी कहीं आज ऊपर जा चुकल रहले।
                                               ©अतुल कुमार यादव

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