कुछ देर हवा भी मचल गयी होती,
कुछ देर जुबां भी फिसल गयी होती।
कुछ देर जुबां भी फिसल गयी होती।
हिमालय के घर न आता ये सूरज,
अगर धूप खुद में बहल गयी होती।
अगर धूप खुद में बहल गयी होती।
शुक्र है कि रूख पे पर्दा है उसके
वरना ये शाम भी टल गयी होती।
वरना ये शाम भी टल गयी होती।
सुना था चाँद जलता है रात में,
उसे देख चाँदनी ढल गयी होती।
उसे देख चाँदनी ढल गयी होती।
चाँद में भी आ गयी होती तपिश,
गर बिन नकाब वो निकल गयी होती।
गर बिन नकाब वो निकल गयी होती।
फिर ख्वाहिशों का तकाजा न होता,
गर ये जिद सच में बदल गयी होती।
गर ये जिद सच में बदल गयी होती।
No comments:
Post a Comment