Saturday, 10 June 2017

प्यार से वो जितने दीप जला रख्खे हैं

प्यार से वो जितने दीप जला रख्खे हैं,
हम धरा पे उतने फूल खिला रख्खे हैं।

बात करनी अब उनसे शहनाई लेकर,
आँसुओं में दिल की आज अना रख्खे हैं।

जख्म़-ए-पाक सफीना टकराता दिल से,
मैं ने' सीने में' कई दर्द छुपा रख्खे हैं।

साथ होकर अब दोस्ती मिलती भी कैसे,
फासले जब हम सिद्दत से' बना रख्खे हैं।

दे दिया है हक़ उसको सच बतलाने का,
झूठ के ही जिसने रंग चढ़ा रख्खे हैं।

इश्क़-ए-चाहत मेरे दिल में जिन्दा है,
ख्वाब सारे दिल के लाश बना रख्खे हैं।

चाँदनी रात मेरी अब जद में कटती है,
रात ने ही दिल के शहर सुला रख्खें हैं।

जिन्दगी के शक़ दिल की दुनिया भटकाते,
नफरतों से लगता आग लगा रख्खे हैं।।
                        ©अतुल कुमार यादव

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