Saturday, 10 June 2017

दीपक

अंधेरों को घना बनाकर,
जलता दीपक है अविराम।
उम्मीदों का सूरज बनकर,
देखो अपना करता काम।
ज्ञान नहीं था जब तक उर में,
करता कैसे इसका गान।
अद्भुत जिसकी काया माया,
तनिक नहीं जिसमें अभिमान।
चाँद चकोरी चपल चाँदनी,
जिसके आगे हैं नाकाम।
पावन मन मंदिर के अन्दर,
वो दीपक जलता अविराम।
अपने गीतों में भरकर,
मैं भेज रहा हूँ थोड़ा प्यार।
हे दीपक तुम देर न करना,
झट से कर लेना स्वीकार।
भावों की ये मद्धिम लपटे,
जलती रहती सुबहों-शाम।
अनुभव की हर लौ बुझने तक,
लगा नहीं दीपक का दाम।
सपनों में हैं धीर बधाता,
नयनों में हिम्मत का धाम।
कोने कोने में इस जग के,
तम से लड़ना जिसका काम।
सुख की चादर झीनी झीनी,
दुख की चादर का है छोर।
मानवता के भाव सजल को,
खींचे दीपक अपनी ओर।
कौन चाहता है इस जग में,
अंधेरो की हो अब बात।
एक दीप हिम्मत का बनकर,
जलना चाहूँ सारी रात।
सुखमय जीवन के निश्चय का,
मानो यह दीपक है द्वार।
इच्छाओं से जुड़ा हुआ है,
इस दीपक का सारा सार।
बर्फ बावड़ी बादल बारिश,
का है ना अब कोई काम।
चंदा सूरज बनकर चमका,
दीपक सुन्दर जिसका नाम।।
          ©अतुल कुमार यादव

No comments:

Post a Comment