Saturday, 10 June 2017

भारत-वन्दन

हमने ही शिव को भेजी थी,
नरमुण्डों की लम्बी माल।
हमने ही काली को रण में,
खप्पर भरते देखा लाल।
कुछ याद करो पुरखों का भी,
जो रखते थे सबका ध्यान।
लोहा माना है दुनिया ने,
अब तक करती है यशगान।
अपने भारत के कण कण तक,
करते संस्कृति का जयगान।
निज समय निज चेतना का ही
हरपस रहता हमको ध्यान।
अपनो के इस अपनेपन पर,
खोया नहीं तनिक विश्वास।
मीरा ने उसी विश्वास में,
पीया घोल जहर का खास।
वो झाँसी थी महा भवानी,
जिसकी चमकी थी तलवार।
बच्चा लेकर फिरती रण में,
जिससे करती बेहद प्यार।
देख मस्तक पर रोली अक्षत,
दुश्मन रण से भगते जाय।
रक्त देखकर चक्कर आते,
वैरी रण में गिरते भाय।
भाला प्रताप का मचला था,
पिस्तौल भगत की उठी बोल।
हे भारत के वीर उठो तुम,
दो शोणित अंग्रेजी तोल।
अविजेय पराक्रम धारी हम,
हर पल हरदम रहते शान्त।
अमृत से बढ़कर भाता है,
सभ्यता संस्कृति व एकान्त।। 
          ©अतुल कुमार यादव

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