Saturday, 10 June 2017

ओस

ओस सी कोमल त्वचा है ओस सी शीतल हो तुम
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।

कर्म पथ पर हम चले हैं जीत के सपने सजोये,
आँकड़े सब दिख रहे हैं भाग्य को अपने सजोये,
तुम कहो तो जीत लूँ मैं ओस की इक बूँद बनकर,
नर्म अंकुर से उठूँगा इस धरा पर जीत बनकर,
जीत कर इतिहास रच दूँ भाग्य सी चंचल हो तुम,
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।

जीत की अंतिम शिखा है तुम मिली हो जोश बनकर,
डूब जाऊँ या किनारों पर मिलूँ मैं ओस बनकर,
हाथों में कंपन है मेरे ओस सा विस्तार दो,
अब आँसुओं को मार आऊँ जीत का अधिकार दो,
ओस सी नूतन रही हो ओस सी कोमल हो तुम,
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।

जीत कर अपनी स्वयं उल्लास लिखना चाहता हूँ,
सांस में तुम हो बसी बस खास लिखना चाहता हूँ,
नैन तुमसे हारकर मन जीत के ज्योति हुए हैं,
अश्रु गिरकर इस धरा पर ओस के मोती हुए हैं,
मोतियों को छूकर आती ओस सी शीतल हो तुम,
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।।
                                            ©अतुल कुमार यादव

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