Saturday, 10 June 2017

चाय

आते जाते खाते पीते,
जब देखो तब देखो चाय।
सोते जगते चलते फिरते,
जब मन हो तब लेते चाय।
सुबह में चाय शाम में चाय,
कदम कदम पे लेते चाय।
लगता मानो देख देख के
जैसे राहत देते चाय।
धूप लगे या छॉव लगे अब
गर्मी जाड़ा या बरसात।
भीगे तन मन या आग लगे,
दिन हो या फिर होवे रात।
नहीं किसी की सुनना है अब,
मुझको मत समझाओ यार।
चाय बना अब जीवन मानो,
करो चाय पे तनिक विचार।
गर्मी या जाड़े का मौसम,
सबको हरदम भाती चाय।
धीरे धीरे पीते जाते,
बिन चाय के जीया न जाय।
कहते रहते देख सभी यह,
बन्द करा दो इनकी चाय।
समझाते थे सब मिल-जुलकर,
पर हमको कुछ समझ न आय।
अपनी धुन में रमता रहता,
किसी की बात सुनता नाय।
अन्धा की थी चाहत हमको,
चाय पे चाय था लेता भाय।
बड़े भाग्य मानुष तन पावा,
पीते रहे चाय पे चाय।
हुयी बिमारी मन की भारी
टाटा बाय फिर टाटा चाय।।
        ©अतुल कुमार यादव

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