Saturday, 10 June 2017

परिन्दा

लिये हाथ में ओछा तिनका,
उड़ने को हूँ मैं तैयार।
कैसे लेकर उड़ना सबको,
जरा करौ तुम तनिक विचार।
कोमल कोमल पंख हमारे,
उड़ने को कहते हैं नाय।
फिर भी मैं तो दम भरता हूँ,
चाहे प्राण निकल भी जाय।
प्राणों की न रही है चिन्ता,
माना नहीं कभी भी हार।
ताल तलैया पार किया है,
पर्वत सागर विविध प्रकार।
हिम्मत ही हिम्मत आँखों में,
पंखों से मैं भरूँ उड़ान।
देखो आसमान में अब तुम,
होती कैसे है पहचान।
आसमान ना वैरी मेरा,
देता रहता हरदम साथ।
गिरा कभी जो आसमान से,
पकड़ा है फैलाकर हाथ।
कलरव से नभ चमके दमके।
जीवित जीवन का उल्लास।
अतरंगी सतरंगी जीवन
पल पल होता मानो खास।
ऊपर नीचे सैर लगाना,
हमको करता है साकार।
पंखों में खुशहाली लेकर,
सम्मुख उड़ने को संसार।
ताकत अपनी बनना खुद है,
किया नहीं खुद को वर्बाद।
नभ में गोते खाता रहता,
एक परिन्दा मैं आजाद।।
        ©अतुल कुमार यादव

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