कवि कवि वह शब्द नहीं है,
जिसमें कविता की हो आग,
शब्द हिमालय मन में लेकर,
सुख का करता है जो त्याग।
बड़े प्यार से रूप बदलकर,
जन जन का करता है गान।
दिल के जख्मों को सी-सीकर,
सबको देता है सम्मान।
आह वाह तो मिलती है पर,
कठिन कंटकों की है चाह।
अबिचल होकर ही चलना बस,
कवि के जीवन की है राह।
मन अशान्त पर सत्य खोजता,
सत्य कवि की सत्य पहचान,
विवश व्यथायें देख देखकर,
जन-मानस में भरता जान।
नहीं ह्रदय में कोई सपने,
नहीं ह्रदय में कोई चाह।
शान्त पथिक हो सोना जगना,
सुखमय कवि जीवन की आह।
कोमल मन भावों को लेकर,
करता रहता सदा विचार।
अपने मन की शीतलता ही,
जग को देता है उपहार।
प्रेम-बन्ध नव छन्द लिखे जो,
उसके जीवन के अनुराग।
पवनों का मकरन्द लिखे तो,
दिल से दिल के जुड़ते ताग।
स्वर लहर का मन्द लिखे तो,
मानो जीवन में मधुमास।
गिरते झरने की बात लिखे तो,
लगे हवायें आती पास।
जीवन में खोकर लिखता है,
अपने मन का वो अहसास।
पनघट मरघट पर लिखता है,
कवि का मन अपना विश्वास।
बूँद बूद कंठों का छूकर,
रच जाती है सुन्दर गीत।
मौन मौन से शब्द बोलते,
कवि के जैसी कवि की प्रीत।।
©अतुल कुमार यादव
जिसमें कविता की हो आग,
शब्द हिमालय मन में लेकर,
सुख का करता है जो त्याग।
बड़े प्यार से रूप बदलकर,
जन जन का करता है गान।
दिल के जख्मों को सी-सीकर,
सबको देता है सम्मान।
आह वाह तो मिलती है पर,
कठिन कंटकों की है चाह।
अबिचल होकर ही चलना बस,
कवि के जीवन की है राह।
मन अशान्त पर सत्य खोजता,
सत्य कवि की सत्य पहचान,
विवश व्यथायें देख देखकर,
जन-मानस में भरता जान।
नहीं ह्रदय में कोई सपने,
नहीं ह्रदय में कोई चाह।
शान्त पथिक हो सोना जगना,
सुखमय कवि जीवन की आह।
कोमल मन भावों को लेकर,
करता रहता सदा विचार।
अपने मन की शीतलता ही,
जग को देता है उपहार।
प्रेम-बन्ध नव छन्द लिखे जो,
उसके जीवन के अनुराग।
पवनों का मकरन्द लिखे तो,
दिल से दिल के जुड़ते ताग।
स्वर लहर का मन्द लिखे तो,
मानो जीवन में मधुमास।
गिरते झरने की बात लिखे तो,
लगे हवायें आती पास।
जीवन में खोकर लिखता है,
अपने मन का वो अहसास।
पनघट मरघट पर लिखता है,
कवि का मन अपना विश्वास।
बूँद बूद कंठों का छूकर,
रच जाती है सुन्दर गीत।
मौन मौन से शब्द बोलते,
कवि के जैसी कवि की प्रीत।।
©अतुल कुमार यादव
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