Saturday, 10 June 2017

घर सूना सूना सा तुम बिन

घर सूना सूना सा तुम बिन आकर अब गुलजार करो,
घर के कोने कोने में तुम पायल की झंकार करो।

ज्यादा नहीं अखरता मुझको अपने मन का सूनापन,
जितना आँखों को चुभता है अपने घर का सूनापन,
सूनेपन में आज बैठकर राह तुम्हारी देख रहा हूँ
करो अलंकृत घर को मेरे ऐसा ही कुछ सोच रहा हूँ,
मेरी आँखों का धुँधलापन बोलो अब क्या छट पाएगा,
उजली सी मुस्कान तुम्हारी बोलो तम क्या छट पाएगा,
घर सूना सूना सा तुम बिन आकर अब गुलजार करो,
घर के कोने कोने में तुम पायल की झंकार करो।

बचपन में सपने देखे थे मुश्किल सारी हल करने को,
नई चेतना नई उमंगे जीवन को मधुमय करने को,
वृद्ध पिता माता की खुशियाँ आँखों में सपने पलते हैं,
साकारित उनको करने की आशा में हम खुद जलते हैं,
सही गलत का निर्णय लेना मेरा कोई काम नहीं है,
नई उम्मीदें नई रौशनी सपनों का अंजाम नहीं है,
घर अपना भी मंदिर है दिल से जो स्वीकार करो,
घर सूना सूना सा तुम बिन आकर अब गुलजार करो।
घर सूना सूना सा तुम बिन आकर अब गुलजार करो,
घर के कोने कोने में तुम पायल की झंकार करो।।
                                            ©अतुल कुमार यादव

दिल में प्रेम की भाषा बहती

दिल में प्रेम की भाषा बहती आँखों में अंगारे हैं,
चेहरे पे चेहरे ही रख कर दिन औ रात गुजारे हैं,

डरी डरी रहती ये काया डरी डरी ही दिखती है,
मानो कोई दौर थमा है नमी आँख की कहती है,
कहते कहते याद किया जो सोच रहा था रातों में,
कितना किसको दर्द दिया हूँ प्यार भरी बरसातों में,
मन में हर पल द्वन्द मचाते भावों के फब्बारे है,
ख्वाब़ सभी उगने लगते हैं लगता जैसे तारे हैं,
दिल में प्रेम की भाषा बहती आँखों में अंगारे हैं,
चेहरे रख के चेहरे पर दिन और रात गुजारे हैं।

जगत समर में व्यथा भँवर में कोई जीता कोई हारा,
मुश्किल से लड़ने को सम्मुख जानो ये जीवन है सारा,
अपने जीवन के हिसाब को देने एक दिन जायेंगे,
कंपित अधर नयन सजल हो मन की व्यथा सुनायेंगे,
मन की आँखों के सम्मुख जो फैले ये अधियारे हैं
जीवन के जंजाल बने है जीवन के अंगारे हैं,
चेहरे पे चेहरे ही रख कर दिन औ रात गुजारे हैं,
दिल में प्रेम की भाषा बहती आँखों में अंगारे है।। 
                                        ©अतुल कुमार यादव

प्यार से वो जितने दीप जला रख्खे हैं

प्यार से वो जितने दीप जला रख्खे हैं,
हम धरा पे उतने फूल खिला रख्खे हैं।

बात करनी अब उनसे शहनाई लेकर,
आँसुओं में दिल की आज अना रख्खे हैं।

जख्म़-ए-पाक सफीना टकराता दिल से,
मैं ने' सीने में' कई दर्द छुपा रख्खे हैं।

साथ होकर अब दोस्ती मिलती भी कैसे,
फासले जब हम सिद्दत से' बना रख्खे हैं।

दे दिया है हक़ उसको सच बतलाने का,
झूठ के ही जिसने रंग चढ़ा रख्खे हैं।

इश्क़-ए-चाहत मेरे दिल में जिन्दा है,
ख्वाब सारे दिल के लाश बना रख्खे हैं।

चाँदनी रात मेरी अब जद में कटती है,
रात ने ही दिल के शहर सुला रख्खें हैं।

जिन्दगी के शक़ दिल की दुनिया भटकाते,
नफरतों से लगता आग लगा रख्खे हैं।।
                        ©अतुल कुमार यादव

तुम पर ही अब कविता लिखता

तुम पर ही अब कविता लिखता कितनी अच्छी लगती हो,
दिल की हो मासूम बहुत तुम मन की सच्ची लगती हो।

नादानी से भरी हुयी हो नादानी ही करती हो
नादानी से इस दुनिया में तनिक नहीं तुम डरती हो,
इतना कोमल ह्रदय लिये तुम बोलो कैसे रह पाती हो,
नफरत की इस दुनिया को तुम बोलो कैसे सह पाती हो,
अपने अपने साथ नहीं है तुम क्यूँ अपना लगती हो,
जब मैं भूखे होता हूँ तो तुम क्यूँ भूखा मरती हो,
दिल की बाते दिल से लिखता दिल को अच्छी लगती हो।
दिल की हो मासूम बहुत तुम मन की सच्ची लगती हो।।

बिखरे बिखरे ख्वाब तुम्हारे बिखरे बिखरे लगती हो,
जीवन पथ पर पत्थर से भी फूल उगाते दिखती हो,
आज समर्पण का मैं तुमको गीत सुनाने आया हूँ।
जीवन की सरिता में अमृत बूँद बूँद भर लाया हूँ,
मानो जीवन की ज्योती हो तुम्हे जलाने आया हूँ,
हँसने और रोने का फिर से नया बहाना लाया हूँ,
मानो मेरे जीवन की तुम कलियाँ कच्ची लगती हो।
दिल की हो मासूम बहुत तुम मन की सच्ची लगती हो।।

दुनिया आँखों से देखा पर दूर रहा हूँ सपनों से,
मौत लिये हाथों में चलता डरा नहीं हूँ अपनों से,
कदम कदम पर जीवन है और कदम कदम पर मौत खड़ी,
धरती अम्बर सूरज कहते मानो तुम हो सोन-परी,
लेकर आओ वरमाला तुम फूलों का अब हार प्रिये,
नजर चुराना छोड़ो मुझसे देना बस तुम प्यार प्रिये,
चंदा जैसी सूरत है और बच्ची जैसी लगती हो,
तुम पर ही अब कविता लिखता कितनी अच्छी लगती हो।

तुम पर ही अब कविता लिखता कितनी अच्छी लगती हो।
दिल की हो मासूम बहुत तुम दिल की सच्ची लगती हो।।
                                            ©अतुल कुमार यादव

मैं दिया हूँ जल उठा

मैं दिया हूँ जल उठा कोई न आये,
वस्ल का लम्हा टला कोई न आये।
सीख लूँगा प्यार करना मुस्कुराकर,
भर रहा हूँ हौसला कोई न आये।
खून का रिश्ता सगा था खो गया है,
जिन्दगी में अब सगा कोई न आये।
देख लो बदली धरा पर छा गयी है,
नर्क की अब इस धरा कोई न आये।
दिल खुदा की परवरिश में आज भी है,
शर्त ये है तीसरा कोई न आये।
वक्त आगे बढ़ रहा है छोड़कर सब,
आज पढ़ने फ़ातिहा कोई न आये।।
                       ©अतुल कुमार यादव

सैनिक

ले हाथों में संगीनों को,
सीमा पर हैं खड़े जवान।
अपनों की खातिर ही ये तो,
दे देते हैं अपनी जान।
इनके ही कारण अब भारत,
दिखलायी देता आजाद।
भारत माँ की सेवा करना,
हरदम इनको रहता याद।
तत्पर सच्चे मन से रहते,
अल्हड़ सी लेकर के जान।
कहते दुश्मन से क्या डरना
सीमा पर हम अड़े जवान।
सरहद खुद से प्यारी लगती,
हमको सेवा का अनुबन्ध।
भारत पर मरने मिटने की,
हम खाते हैं अब सौगन्ध।
दुख का सूरज हिम्मत दे,
सुख का सूरज भरें उड़ान।
कोई वार न खाली जाये,
दे दो उनको यह वरदान।
मैं अदना सा कलमकार हूँ,
सैनिक भाषा से अंजान।
कलम उठाकर बन्दूकों का
कैसे कर दूँ अब मैं गान।
सतत् कर्म की कहूँ कहानी,
लेकर सैनिक के अधिकार।
दुश्मन पर जब करें चढ़ायी,।
कॉप रहें तब सब गद्दार।
विस्फोटों से गूँज रहा अब,
जै जै जय हे वीर जवान।
अजर अमर कहलाये भारत,
अपना प्यारा हिन्दुस्तान।
ले हाथों में संगीनों को,
सीमा पर हैं खड़े जवान।
तत्पर सच्चे मन से रहते,
अल्हड़ सी लेकर के जान।
मैं अदना सा कलमकार हूँ,
सैनिक भाषा से अंजान।
अजर अमर कहलाये भारत,
जै जै जय हे वीर जवान।।
         ©अतुल कुमार यादव

नेता

वादो से अपने मुकर गया,
नेता को भायी यह रीत।
होगा सब कुछ फाइल में ही,
नेता को भायी यह प्रीत।
कालीन भरी सड़के होगी,
सभी भरेंगे सरपट दौड़।
साथ साथ है विकाश सबका,
हुये नेता प्रणेता गौड़।
दुल्हन विकाश की गली गली,
चुप रहती बस सहती पीर।
अंधेरे के साये में ही,
कभी नहीं रख पाती धीर।
जगता रहता जीवन हर पल,
लेकर सपने कुछ मनुहार।
सोता है अब प्रखर आचरण,
मानो रोता है परिवार।
सबसे लड़ता भिड़ता अब तो,
गरीब सम्मुख नेता व्याल।
सत्कर्म ध्येय रहा नहीं अब,
सारे जलते है इक ज्वाल।
आओ मिलकर चले साथ अब,
संसद में हो दो-दो हाथ।
ना होगा बातों से कुछ अब,
मिलकर सारे छोड़ो साथ।
नहीं किया प्रतिरोध अभी तक,
जिससे होते हैं बर्बाद।
इतना सब कुछ होने पर भी
करते रहते जिन्दाबाद।
नेता बस आँखें दिखलाता,
सारे दुख देने के बाद।
भारत के पैसे के बल से,
मौज उड़ाता है आजाद।।
         ©अतुल कुमार यादव

भारत-वन्दन

हमने ही शिव को भेजी थी,
नरमुण्डों की लम्बी माल।
हमने ही काली को रण में,
खप्पर भरते देखा लाल।
कुछ याद करो पुरखों का भी,
जो रखते थे सबका ध्यान।
लोहा माना है दुनिया ने,
अब तक करती है यशगान।
अपने भारत के कण कण तक,
करते संस्कृति का जयगान।
निज समय निज चेतना का ही
हरपस रहता हमको ध्यान।
अपनो के इस अपनेपन पर,
खोया नहीं तनिक विश्वास।
मीरा ने उसी विश्वास में,
पीया घोल जहर का खास।
वो झाँसी थी महा भवानी,
जिसकी चमकी थी तलवार।
बच्चा लेकर फिरती रण में,
जिससे करती बेहद प्यार।
देख मस्तक पर रोली अक्षत,
दुश्मन रण से भगते जाय।
रक्त देखकर चक्कर आते,
वैरी रण में गिरते भाय।
भाला प्रताप का मचला था,
पिस्तौल भगत की उठी बोल।
हे भारत के वीर उठो तुम,
दो शोणित अंग्रेजी तोल।
अविजेय पराक्रम धारी हम,
हर पल हरदम रहते शान्त।
अमृत से बढ़कर भाता है,
सभ्यता संस्कृति व एकान्त।। 
          ©अतुल कुमार यादव

परिन्दा

लिये हाथ में ओछा तिनका,
उड़ने को हूँ मैं तैयार।
कैसे लेकर उड़ना सबको,
जरा करौ तुम तनिक विचार।
कोमल कोमल पंख हमारे,
उड़ने को कहते हैं नाय।
फिर भी मैं तो दम भरता हूँ,
चाहे प्राण निकल भी जाय।
प्राणों की न रही है चिन्ता,
माना नहीं कभी भी हार।
ताल तलैया पार किया है,
पर्वत सागर विविध प्रकार।
हिम्मत ही हिम्मत आँखों में,
पंखों से मैं भरूँ उड़ान।
देखो आसमान में अब तुम,
होती कैसे है पहचान।
आसमान ना वैरी मेरा,
देता रहता हरदम साथ।
गिरा कभी जो आसमान से,
पकड़ा है फैलाकर हाथ।
कलरव से नभ चमके दमके।
जीवित जीवन का उल्लास।
अतरंगी सतरंगी जीवन
पल पल होता मानो खास।
ऊपर नीचे सैर लगाना,
हमको करता है साकार।
पंखों में खुशहाली लेकर,
सम्मुख उड़ने को संसार।
ताकत अपनी बनना खुद है,
किया नहीं खुद को वर्बाद।
नभ में गोते खाता रहता,
एक परिन्दा मैं आजाद।।
        ©अतुल कुमार यादव

चाय

आते जाते खाते पीते,
जब देखो तब देखो चाय।
सोते जगते चलते फिरते,
जब मन हो तब लेते चाय।
सुबह में चाय शाम में चाय,
कदम कदम पे लेते चाय।
लगता मानो देख देख के
जैसे राहत देते चाय।
धूप लगे या छॉव लगे अब
गर्मी जाड़ा या बरसात।
भीगे तन मन या आग लगे,
दिन हो या फिर होवे रात।
नहीं किसी की सुनना है अब,
मुझको मत समझाओ यार।
चाय बना अब जीवन मानो,
करो चाय पे तनिक विचार।
गर्मी या जाड़े का मौसम,
सबको हरदम भाती चाय।
धीरे धीरे पीते जाते,
बिन चाय के जीया न जाय।
कहते रहते देख सभी यह,
बन्द करा दो इनकी चाय।
समझाते थे सब मिल-जुलकर,
पर हमको कुछ समझ न आय।
अपनी धुन में रमता रहता,
किसी की बात सुनता नाय।
अन्धा की थी चाहत हमको,
चाय पे चाय था लेता भाय।
बड़े भाग्य मानुष तन पावा,
पीते रहे चाय पे चाय।
हुयी बिमारी मन की भारी
टाटा बाय फिर टाटा चाय।।
        ©अतुल कुमार यादव

दीपक

अंधेरों को घना बनाकर,
जलता दीपक है अविराम।
उम्मीदों का सूरज बनकर,
देखो अपना करता काम।
ज्ञान नहीं था जब तक उर में,
करता कैसे इसका गान।
अद्भुत जिसकी काया माया,
तनिक नहीं जिसमें अभिमान।
चाँद चकोरी चपल चाँदनी,
जिसके आगे हैं नाकाम।
पावन मन मंदिर के अन्दर,
वो दीपक जलता अविराम।
अपने गीतों में भरकर,
मैं भेज रहा हूँ थोड़ा प्यार।
हे दीपक तुम देर न करना,
झट से कर लेना स्वीकार।
भावों की ये मद्धिम लपटे,
जलती रहती सुबहों-शाम।
अनुभव की हर लौ बुझने तक,
लगा नहीं दीपक का दाम।
सपनों में हैं धीर बधाता,
नयनों में हिम्मत का धाम।
कोने कोने में इस जग के,
तम से लड़ना जिसका काम।
सुख की चादर झीनी झीनी,
दुख की चादर का है छोर।
मानवता के भाव सजल को,
खींचे दीपक अपनी ओर।
कौन चाहता है इस जग में,
अंधेरो की हो अब बात।
एक दीप हिम्मत का बनकर,
जलना चाहूँ सारी रात।
सुखमय जीवन के निश्चय का,
मानो यह दीपक है द्वार।
इच्छाओं से जुड़ा हुआ है,
इस दीपक का सारा सार।
बर्फ बावड़ी बादल बारिश,
का है ना अब कोई काम।
चंदा सूरज बनकर चमका,
दीपक सुन्दर जिसका नाम।।
          ©अतुल कुमार यादव

कवि

कवि कवि वह शब्द नहीं है,
जिसमें कविता की हो आग,
शब्द हिमालय मन में लेकर,
सुख का करता है जो त्याग।
बड़े प्यार से रूप बदलकर,
जन जन का करता है गान।
दिल के जख्मों को सी-सीकर,
सबको देता है सम्मान।
आह वाह तो मिलती है पर,
कठिन कंटकों की है चाह।
अबिचल होकर ही चलना बस,
कवि के जीवन की है राह।
मन अशान्त पर सत्य खोजता,
सत्य कवि की सत्य पहचान,
विवश व्यथायें देख देखकर,
जन-मानस में भरता जान।
नहीं ह्रदय में कोई सपने,
नहीं ह्रदय में कोई चाह।
शान्त पथिक हो सोना जगना,
सुखमय कवि जीवन की आह।
कोमल मन भावों को लेकर,
करता रहता सदा विचार।
अपने मन की शीतलता ही,
जग को देता है उपहार।
प्रेम-बन्ध नव छन्द लिखे जो,
उसके जीवन के अनुराग।
पवनों का मकरन्द लिखे तो,
दिल से दिल के जुड़ते ताग।
स्वर लहर का मन्द लिखे तो,
मानो जीवन में मधुमास।
गिरते झरने की बात लिखे तो,
लगे हवायें आती पास।
जीवन में खोकर लिखता है,
अपने मन का वो अहसास।
पनघट मरघट पर लिखता है,
कवि का मन अपना विश्वास।
बूँद बूद कंठों का छूकर,
रच जाती है सुन्दर गीत।
मौन मौन से शब्द बोलते,
कवि के जैसी कवि की प्रीत।।
             ©अतुल कुमार यादव

कविता

कविता शब्द बड़ा ही सुन्दर,
सुन्दर सुन्दर कवि के भाव।
शब्दों की सूरत दिखती है,
कवि के सपनों की है नाव।
लय की भाषा पढ़ लो मन से,
आभाषित मन की है जान।
मेरे मन मंदिर में बैठी।
मानो कविता हो भगवान।
दुख के बदले सुख उपजाती,
सुख का मानो है संसार।
सपनों का सौदा आँखों से,
कवि को करना है स्वीकार।
दुनिया की यह रीति बड़ी है,
मन में नहीं आस-विश्वास।
सम्मोहन के इस दलदल में,
जाना नहीं किसी के पास।
कविता कविता कहलाती है,
कविता कहती मन की बात।
मन की बातों से अब देखों,
दिखा गयी अपने जज्बात।
अनुभव सारे सच करती है,
मुझको होता है अहसास।
हर पल तुम महसूस करो अब,
दिख जायेगा जीवन खास।
जो बातें करनी मुश्किल है,
लगती उसकी है आधार,
आँसू पीड़ा मन में लेकर,
लुटा रहीं है खुद से प्यार।
कविता मन की भाव समन्दर,
लहरें उठती सौ सौ बार।
कवि के मन की इस हलचल में,
करुणा करती करुण पुकार।
आँखों में आँसू का मतलब,
देखों किसमें कितना प्यार।
होठों में खामोशी लेकर,
लिख दो अपना जीवन सार।
मेरी कविता मुझसे कहती,
अलग रखो अपनी पहचान।
करो साधना उसकी हर पल,
जिससे जीवन में मुस्कान।।
          ©अतुल कुमार यादव

कुछ देर हवा भी मचल गयी होती,

कुछ देर हवा भी मचल गयी होती,
कुछ देर जुबां भी फिसल गयी होती।
हिमालय के घर न आता ये सूरज,
अगर धूप खुद में बहल गयी होती।
शुक्र है कि रूख पे पर्दा है उसके
वरना ये शाम भी टल गयी होती।
सुना था चाँद जलता है रात में,
उसे देख चाँदनी ढल गयी होती।
चाँद में भी आ गयी होती तपिश,
गर बिन नकाब वो निकल गयी होती।
फिर ख्वाहिशों का तकाजा न होता,
गर ये जिद सच में बदल गयी होती।
न आँख में आँसू न दिल में पीड़ा,
जो यादें 'अतुल' की जल गयी होती।।
                 ©अतुल कुमार यादव

कहानी : राह क फूल

            गंगा मईया के लहर उफान पर रहे, पानी एकदम ठंडा गईल रहे अउर ठंडायें भी काहे न? जब सूरज क चार दिन से पते ना रहे ऊपर से ठंडी के मौसम। सगरो सड़क विरान नजर आवत रहे। गंगा मईया भी धीरे धीरे किनारे की ओर बढ़त आवत रहलीं। लोगन के आवा-जाही ठप रहे। सब अपना-अपना घर में छुप के बइठल-सुतल रहे। अउर अईसना मौसम में एगो झाड़ी के पीछे से कुछ हलचल अउर आवाज आवत रहे। कुछ महिन स्वर सुनाई पड़ल- 'रेखा हमनी के कबले अईसे छुप छुप के मिलत रहल जाई? कबले इ समाज हमनी के स्वीकार करी?' रेखा बोल उठल : 'रोहन एहगने मत बोलs, हिम्मत राखs सब ठीक हो जाई, समाज बदले ना बदल जाला।' रोहन सुन के बोल उठल :' अरे ना रे रेखा! हम अउर इंतजार नईखी कर सकत। ई हमार समाज हमरा जीयल नईखे देहल चाहत। ई रूढ़िवादी परम्परा देखत हई ना? ऊपर से ई हाथ पॉव में पड़ल जाति-पाति छुआ-छूत के बेमारी, समाज के कोढ़। रेखा हमनी के ई जीये ना दी रे समाज।' एतना कहत कहत रोहन के आँख भर गईल, आँख से आँसू निकल के गाल पर ढरक गईल। 
              रेखा देख के इ सब भावूक हो गईल कुछ बोल ना पावत रहे। बड़ी हिम्मत कके रोहन के हाथ पकड़ के सीना पर लगा लेहलस अऊर बोल पड़ल : 'रोहन! जवन चाहत हव न तू उहे होई। ई समाज हमनी के कबो ना अलग कर सकेला। लेकिन तू कहीं एह समाज के डर से हमरा के मँझधार में तs ना न छोड़ देबs। एतना बोलत-बोलत रेखा रोहन के गले से लगा लिहलस अउर सिसक सिसक के रोवे लागल। रोहन रेखा के बाल सहला के बोलल पड़ल.. अरे रो मत पगली हम तोरा बहुत प्यार करेलीं। तू गंगा मईया के पानी लेखा एकदम पवित्र बाड़ी। तोरा के हम कबो मझधार में ना छोड़ सकी ले।
               लेकिन साहब समाज लोगन से बड़ से बड़ पाप करवा देला, लोगन के हौसला तोड़ देला, बड़ बड़ लोगन के एक दूसरा से अलगा कर देला। रेखा के एह बात के डर दिल में लागल रहे, धीरे धीरे गंगा मईया के पानी की ओर कदम बढ़े लागल, रेखा एक ओर डेग डाले त दूसरी ओर बहुत कुछ सोचत रहे: कहीं रोहन भी सब पाप कईला के बाद "राह क फूल" बना के छोड़ त ना दिहीं, एह से सोचत सोचत बोल पड़ल, ऐ रोहन! कहीं हमरा के "राह क फूल" बना के छोड तs...। रेखा एतने बोलल रहे कि रोहन मुँह पे हाथ रख देहलस। रेखा के फिर से गले लगा लेहलस। फिर गंगा मईया के पानी हाथ से उठा के रेखा के हाथ में रख देहलस। हाथ में पानी राख के बोलल "रेखा! गंगा मईया के पानी क कीरिया! चाहे जान चल जाई पर तोर साथ कबो छोड़ ना सकेली। एह बात के हम कसम उठावत बानी।' धीरे धीरे बोलत बतियावत रेखा रोहन गंगा मईया के किनारा छोड़ गॉव के किनारे आ गईले। फिर दूनो अलग अलग दिशा में अपना घरे के चल दिहलें।
                समय क पहिय दिन रात चलत रहे। रोहन के सपना आज साकार हो गईल। रोहन के बी.ए. कईला के बाद लेफ्टिनेंट के ट्रेनिंग देबे बदे देहरादून जाये के कागज आ गईल। पूरा गॉव मोहल्ला खुश, रोहन पूरा गॉव के बेटा हो गईल। धीरे-धीरे समय बीतल अऊर रोहन के जाये के समय आ गईल। पूरा गॉव ढोल के थाप पर थिरकत चल देहलस रोहन के पीछे-पीछे रास्ता धरावे। सब लोग हँस खिलत रहे पर आज एह खुशी के बेला में एगो चेहरा खामोश नजर आवत रहे। उ चेहरा रहल रेखा के। रोहन के निगाह रेखा पर पड़ल त रोहन से रह ना गईल। दउड़ के जाके रेखा के सामने खड़ा होईल..। ठुट्टी पर हाथ लगाके रेखा के चेहरा ऊपर उठावल त रेखा के आँख में आँसू देख के सन्न रह गईल। लागल कि रोहन के कलेजा फट गईल। बहुत हिम्मत कके रोहन बोलल "रोवत का हई पगली! ट्रेनिंग पूरा क के जल्दिये आ जाईब। फिर धूम धाम से शहनाई बजी शादी कईल जाई।" फिर रेखा के रोहन गले लगईलस फिर सामने खड़ी गाड़ी की तरफ चल देहलस। गाड़ी में बईठला के बाद रेखा की तरफ रोहन देखलस त रेखा के आँख ओकरा के ही देखत रहे। अचानक रेखा बोल पड़ल : "हम तहरे प्यार......।" तबही गाड़ी चल देहलस अउर रेखा के आवाज उहें दब गईल। रोहन भी गाड़ी में बईठल में सोच पड़ गईल कि रेखा आखिर कहल का चाहत रहे। "हम तहरे प्यार..." आगे का हो सकेला?? सोचत सोचत रोहन के नींद लाग गईल। 
अगले दिन सूरज के रोशनी रोहन के ऊपर पड़ल। कुछ गर्मी के अहसास भईल त रोहन के नींद खुल गईल। देखले त गाड़ी सरपट भागत जा रहे। अचानक फिर रेखा के याद आ गईल फिर उहे सवाल दिमाग में आ गईल जवना सवाल के साथ रोहन के नींद लाग गईल रहे। अचानक रोहन के दिमाग में आईल कि कहीं रेखा के प्यार मतलब त ई ना कि उ हमारा बच्चा के माँ बने वाली बिया। नाहीं अईसन ना हो सकेला। खैर बहुत कुछ दिमाग में चलला के बाद रोहन के दिमाग से उ सवाल गायब हो गईल।
            धीरे धीरे समय बितल। रोहन अपना परिवेश में ढल गईले। साथियन के साथे समय बीते लागल, रेखा के याद भी अब उनका तड़पावल कम कर देहलस। इधर रेखा के हाल बुरा होत गईल। रोहन के ना रहला से रेखा बहुत परेशान रहे लागल। घर वालन से रह ना गईल त रेखा से पूछे लगलन कि भईल का बा। एक दिन अपना माई से रेखा सब कुछ कुछ बता देहलस। माई जाके बाबू जी से कह देहली कि रेखा रोहन से प्यार करेले अउर ओकरा बच्चा के माँ बने वाली बिया। रेखा के बाप सुन के बेहोश होके जमीन पर गिर पड़ले। आखिर कुछ दिन बाद रेखा भी रोहन के बच्चा के माँ बन गईल। 
            इधर धीरे धीरे कुछ दिन बाद रोहन के ट्रेनिंग खत्म हो गईल। ट्रेनिंग खत्म भईला के बाद रोहन घरे आ गईल। अवते आवत रोहन के पापा रोहन के शादी के प्रस्ताव रख देहलीं। रोहन मना कर देहलस। पिता जी के पूछला पर रोहन बता देहलस कि उ रेखा से प्यार करेला और उ रेखा से ट्रेनिंग देबे गईला से पहिलहीं गॉव के मन्दिर में शादी कर लेले बे। एह बात के जानकारी रोहन के पापा के बर्दास ना भईल। गस्त खाके जमीन पर गिर पड़ले। दिल के दौरा पड़ गईल। बहुत परेशान भईला के बाद हालत सुधार भईल। तबहिं डाकिया एगो डाक लेहले रोहन के घरे दाखिल हो गईल। रोहन लेहलस अउर देखलस त पता लागल लड़ाई लागल बे एहसे ओके तुरन्त नौकरी ज्वाईन करे के पड़ी। रोहन तुरन्त तैयार भईल, पापा के पॉव छुअलस अउर निकल गईल। गाँव से निकलते रेखा याद आ गईल। रोहन रेखा के घर की ओर पॉव बढ़ा देहले। पहूँचले पर रोहन के अपना पापा बनले क जानकारी मिलल। बहुत खुश भईले, कुछ देर ठहरला के बाद रोहन रेखा के हाथ अपने हाथ में लिहलस फिर गले लगउलस बेटा के माथे पर चुम्बन अंकित कईलस अउर फिर निकल गईल लड़ाई लड़े बदे। जब रोहन जाये के बात रेखा से बतलस त रेखा ओ दिन फिर से रोवे लागल, बोल पड़ल रोहन से हमारा सोहाग के मत छिनी। पर रोहन रेखा के एक न सुनलस। कोमल गाल के पंखड़ी पर आँख से पानी लगातार ढरकत रहे। पर अपना कर्तव्य के प्रति संकल्पित भईला के कारन रोहन खुद के रोक न पऊलस अउर मातृभुमि के रक्षा बदे निकल गईल।
           पहूँचतही रोहन देखलस कि युद्ध बहुत विकराल स्थिति में पहूँच गईल रहे। नजारा देखतहीं कुछ सोचे के ना पड़ल सब कुछ समझ में आ गईल। दू दू चौकी के प्रतिनिधित्व के जिम्मेदारी अपना कंधा पर देख मुस्तैदी लड़े लागल। मुस्तैदी से लड़त लड़त रोहन से चुक हो गईल। दू गो गोली सनसनात रोहन के देह मे दाखिल हो गईल। एगो कंधा के छेदत आर-पार निकल गईल। दूसरी सीना मे धँस गईल। फिर भी हिम्मत ना हारल रोहन। जबले साहस रहल तबले लड़त रहल। जब ना साहस रह गईल तब जमीन पर गिरे लागल । गिरला से पहिले बोल उठल! साथी लोग अब मातृभुमि के रक्षा करिह जा। जय हिन्द बोल के रोहन वीरगति प्राप्त कर लीहलस।
          कुछ दिन बाद युद्ध समाप्त भईल। रेड क्रास सोसाईटी वाला लोग लाश उठावल, घायल लोग के दवा उपचार करवावल, शहीद लोग के घर खबर भेजला के जिम्मेदारी करे लागल लोग। एक दिन एगो डाक फिर डाकिया लेके रोहन के बाबू जी के पास पहूँचल। जवना में संवेदना अउर रोहन के वीरता के उल्लेख रहल। संवेदना के समाचार पढ़ला के बाद रोहन के बाबूजी काठ बन गईले। कुछ देर बाद जब चेतना से जगले त बेटा के मरला के गहरा दुख झेले के हिम्मत अपना में भरले। बहादूर बेटा के बाप आज बेटा के बहादुरी अउर सम्मान के मउत क संतोष लेके जीये लगले। मरला के बाद रोहन के मरमोपरान्त महावीर चक्र से सम्मानित कईल गईल।
          इधर रेखा क सुहाग लुट चुकल रहे। एह बेला में रेखा अकेल और निसहाय हो चुकल रहे। अपना के कोष-कोष के, रो-रो केआपन बुरा हाल कर लेहलस। रोवत रोवत बस एतने कह पावत रहल : 'रोहन! सच में आज हमरा के उ " राह क फूल" बना देहल जवना के आज केहूँये मसल सकेला आ फेंक सकेला। तबहीये रोहन के आज रेखा के घर के दहलीज पर कदम रख देहले अउर बोल पड़ले : 'ना रेखा बिटिया तू "राह के फूल" ना हमरा हमरा घर के बहू बाड़ी, हमरा घर के इज्जत बाड़ी। तोरा के केहूँ मसल नईखें सकते ना ही तोरा के केहूँ फेंक सकेला। चल बेटा अब अपना घरे चल। रेखा अपना बच्चा के लेहले आज रोहन के घर में दाखिल हो गईल। रोहन के पापा के आज आँख खुल गईल रहे, समाज के रूढ़िवादी परम्परा अऊर अंधविश्वास से रोहन पिता जी कहीं आज ऊपर जा चुकल रहले।
                                               ©अतुल कुमार यादव

जमाना है, मुकद्दर है

जमाना है, मुकद्दर है, मुहब्बत है परेशानी,
जवानी है, अकीदत है, इबादत है परेशानी।
गुजारिश है, इजाजत है, जरा तुम गौर से देखो।
मुसाफिर हैं, सफर में हैं, हकीकत है परेशानी।
सहारा है, इशारा है, नदी का बस किनारा है।
समन्दर को मिटाने की, शरारत है परेशानी।
दिवाना है, दिवानी है, बहाना है उसूलों का।
कहाँ जायें किधर जायें, बग़ावत है परेशानी।
बताना है, दिखाना है, छिपाना है जमाने से।
अदायें जान लेती पर, अदावत है परेशानी।
भलाई है, बुराई है, गलतफ़हमी इशारें हैं।
उठी आवाज दिल की तो, हिमाकत है परेशानी।
किसानी को भरोसा है, उसे सूरज उगाना है।
नया करके दिखाने पर, सियासत है परेशानी।।
                                        ©अतुल कुमार यादव

ओस

ओस सी कोमल त्वचा है ओस सी शीतल हो तुम
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।

कर्म पथ पर हम चले हैं जीत के सपने सजोये,
आँकड़े सब दिख रहे हैं भाग्य को अपने सजोये,
तुम कहो तो जीत लूँ मैं ओस की इक बूँद बनकर,
नर्म अंकुर से उठूँगा इस धरा पर जीत बनकर,
जीत कर इतिहास रच दूँ भाग्य सी चंचल हो तुम,
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।

जीत की अंतिम शिखा है तुम मिली हो जोश बनकर,
डूब जाऊँ या किनारों पर मिलूँ मैं ओस बनकर,
हाथों में कंपन है मेरे ओस सा विस्तार दो,
अब आँसुओं को मार आऊँ जीत का अधिकार दो,
ओस सी नूतन रही हो ओस सी कोमल हो तुम,
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।

जीत कर अपनी स्वयं उल्लास लिखना चाहता हूँ,
सांस में तुम हो बसी बस खास लिखना चाहता हूँ,
नैन तुमसे हारकर मन जीत के ज्योति हुए हैं,
अश्रु गिरकर इस धरा पर ओस के मोती हुए हैं,
मोतियों को छूकर आती ओस सी शीतल हो तुम,
बसुन्धरा भी कह रही है ओस सी निर्मल हो तुम।।
                                            ©अतुल कुमार यादव