तुम पर ही अब कविता लिखता कितनी अच्छी लगती हो,
दिल की हो मासूम बहुत तुम मन की सच्ची लगती हो।
नादानी से भरी हुयी हो नादानी ही करती हो
नादानी से इस दुनिया में तनिक नहीं तुम डरती हो,
इतना कोमल ह्रदय लिये तुम बोलो कैसे रह पाती हो,
नफरत की इस दुनिया को तुम बोलो कैसे सह पाती हो,
अपने अपने साथ नहीं है तुम क्यूँ अपना लगती हो,
जब मैं भूखे होता हूँ तो तुम क्यूँ भूखा मरती हो,
दिल की बाते दिल से लिखता दिल को अच्छी लगती हो।
दिल की हो मासूम बहुत तुम मन की सच्ची लगती हो।।
बिखरे बिखरे ख्वाब तुम्हारे बिखरे बिखरे लगती हो,
जीवन पथ पर पत्थर से भी फूल उगाते दिखती हो,
आज समर्पण का मैं तुमको गीत सुनाने आया हूँ।
जीवन की सरिता में अमृत बूँद बूँद भर लाया हूँ,
मानो जीवन की ज्योती हो तुम्हे जलाने आया हूँ,
हँसने और रोने का फिर से नया बहाना लाया हूँ,
मानो मेरे जीवन की तुम कलियाँ कच्ची लगती हो।
दिल की हो मासूम बहुत तुम मन की सच्ची लगती हो।।
दुनिया आँखों से देखा पर दूर रहा हूँ सपनों से,
मौत लिये हाथों में चलता डरा नहीं हूँ अपनों से,
कदम कदम पर जीवन है और कदम कदम पर मौत खड़ी,
धरती अम्बर सूरज कहते मानो तुम हो सोन-परी,
लेकर आओ वरमाला तुम फूलों का अब हार प्रिये,
नजर चुराना छोड़ो मुझसे देना बस तुम प्यार प्रिये,
चंदा जैसी सूरत है और बच्ची जैसी लगती हो,
तुम पर ही अब कविता लिखता कितनी अच्छी लगती हो।
तुम पर ही अब कविता लिखता कितनी अच्छी लगती हो।
दिल की हो मासूम बहुत तुम दिल की सच्ची लगती हो।।
©
अतुल कुमार यादव