अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
अभिनय के इस महा भ्रमर मे,
जीवन के हर मिथ समर में,
उन्मुक्त उदार सम्पूर्ण भुवन में,
अब हमको मत तोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
चारों तरफ है सुधा बरसती,
मौन चाँदनी फिर क्यूँ तरसती,
जीवन के इस नव सागर में,
अब मन में मिस्री घोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
जगमग ज्योति जगाते आये,
अधियारों को भगाते आये,
लिपटाकर अपनी बाहूलता में,
अब आडम्बर मत बोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
अभी शेष है गीत हमारी,
अभी विशेष है प्रीत हमारी,
धूल धुसरीत रीते है हँसती,
उस रीत-प्रीत में डोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
अति गहन है वेदना मन की,
अब स्थिर हुयी चेतना तन की,
है आँखे रचती भाषा जन की,
जीवन की आशा बोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
©अतुल कुमार यादव.
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
अभिनय के इस महा भ्रमर मे,
जीवन के हर मिथ समर में,
उन्मुक्त उदार सम्पूर्ण भुवन में,
अब हमको मत तोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
चारों तरफ है सुधा बरसती,
मौन चाँदनी फिर क्यूँ तरसती,
जीवन के इस नव सागर में,
अब मन में मिस्री घोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
जगमग ज्योति जगाते आये,
अधियारों को भगाते आये,
लिपटाकर अपनी बाहूलता में,
अब आडम्बर मत बोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
अभी शेष है गीत हमारी,
अभी विशेष है प्रीत हमारी,
धूल धुसरीत रीते है हँसती,
उस रीत-प्रीत में डोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
अति गहन है वेदना मन की,
अब स्थिर हुयी चेतना तन की,
है आँखे रचती भाषा जन की,
जीवन की आशा बोल प्रिये तू,
अधरों का पट खोल प्रिये तू,
कुछ ना कुछ तो बोल प्रिये तू||
©अतुल कुमार यादव.
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