बहुत कुछ कहा था बहुत कुछ कहूँगा,
तुम्हारे बिना कैसे' जिन्दा रहूँगा।
तुम्हीं हो हमारे हम्हीं हैं तुम्हारे,
बताओं यही शब्द किससे कहूँगा।
खुशी कुछ हमें है खुशी कुछ तुम्हें है,
खुशी का सफीना लिए बस बहूँगा।
मुनासिब नहीं है दिवारें उठाना,
उठी गर दिवारें ढहा के रहूँगा।।
शिकायत रही है शिकायत रहेंगी,
खतायें लिए क्या मैं' जिन्दा मरूँगा।
"अतुल" है रहा जो "अतुल" ही रहेगा,
"अतुल" की न तुलना किसी से करूँगा।।
©अतुल कुमार यादव.
तुम्हारे बिना कैसे' जिन्दा रहूँगा।
तुम्हीं हो हमारे हम्हीं हैं तुम्हारे,
बताओं यही शब्द किससे कहूँगा।
खुशी कुछ हमें है खुशी कुछ तुम्हें है,
खुशी का सफीना लिए बस बहूँगा।
मुनासिब नहीं है दिवारें उठाना,
उठी गर दिवारें ढहा के रहूँगा।।
शिकायत रही है शिकायत रहेंगी,
खतायें लिए क्या मैं' जिन्दा मरूँगा।
"अतुल" है रहा जो "अतुल" ही रहेगा,
"अतुल" की न तुलना किसी से करूँगा।।
©अतुल कुमार यादव.
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