Tuesday, 17 December 2019

ग़ज़ल : आँख में कुछ रात लेकर लौट आये

ग़ज़ल غزل
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आँख में कुछ रात लेकर लौट आये,
अब्र की बरसात लेकर लौट आये।

काँच के कुछ ख़्वाब पलकों पर सजे थे,
वक़्त ए लम्हात लेकर लौट आये।

उम्र से बढ़कर तमन्ना उम्र से क्या?
ज़िंदगी जज्बात लेकर लौट आये।

चाहते थे हम दिखाना दस्तरस दिल,
दर्द दिल हज़रात लेकर लौट आये।

और ग़ुजरी शब कभी आनी नहीं थी,
उम्र ए दिन रात लेकर लौट आये।

बुझ गये जलते मसाइल आज दिल में,
बा-ख़ुदा औक़ात लेकर लौट आये।

बे-वुज़ू होकर 'अतुल' तो रू-ब-रू है,
बस हम्ही सह-मात लेकर लौट आये।।
                            ©अतुल कुमार यादव
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Sunday, 17 November 2019

नागफनियाँ

तुम्हारे आने की आहट पाकर
मैंने गुलमोहर के बीज
केवड़े की कलमे
और कुछ हरसिंगार के बिरवे
अपने आँगन में लगाये थे।

नित नये सृजन करने वाली धरती में
न गुलमोहर के बीज अंकुरित हुए
न केवड़े की कलमे अन्खुआई
न हरसिंगार के बिरवे बड़े हुए।
बदले में आज हमारे भीतर
दुख के कुछ नये बिरवे उग आये हैं।

जिस चंपई रंग को मैं
तुम्हारे स्वागत में
सहेजना चाहता था,
जिस गुलदस्ते को मैं
तुम्हें सौंपना चाहता था
वो तुम्हारे न आने पर
ख़ुद ब ख़ुद बिखर गए हैं।

तुम आये तो नहीं लेकिन
आँगन में फलते फूलते नींबू की ख़ुशबू
आज भी तुम्हारे आने की उम्मीद लिए है।

और अब जब लौट रहा हूँ मैं
तुम्हारे स्मृतियों के भीतर से
अपने आप से संवाद करते हुए
तब तुम्हारे प्रतिक्षा में
मन के आँगन में कुछ
नागफनियाँ उग आयी हैं।

और अब वही नागफनियाँ
मेरे अन्दर पसरे सन्नाटे में
बे मौसम ही चुभ रही हैं।
       ©अतुल कुमार यादव

Thursday, 17 October 2019

विजेता

मैं जिंदगी जीने की चाहत लिए
पूरी जिंदगी जी चुका हूँ।
एक मदारी की तरह
तमाम करतब दिखा चुका हूँ
या फिर जुआरी की तरह
अपनी पूरी कमाई लुटा चुका हूँ।

मगर अब जिंदगी चाहती है
फिर से अपने दायित्वों का बोझ
उठाने के काबिल बनूँ।
फिर से मेरी जिंदगी का सफ़र
निर्बाध और सरल हो।
और मैं एक विजेता की तरह
इस दुनिया से विदा हो जाऊँ।

लेकिन इस जिंदगी को
ये नहीं पता है कि
जिससे वह सारी उम्मीद लिए है
वो इक उस ठूंठ वृक्ष की तरह है
जिस पर न पल लगेंगे,
और न ही वह छाया दे सकता है।

क्योंकि वह अपनी
पूरी जिंदगी काट चुका है
और खु़शी-खु़शी इस जमाने से
विदा होने की चाहत लिए
जिंदगी के आखिरी पल गिन रहा है।

ज़िंदगी जिसको इक विजेता की तरह
विदा करना चाहती है
वह ख़ुद
अपने लहू के इक इक कतरे को
इस जमी में सींच कर
तमाम वृक्षों के उगने की संभावनाएँ लिए
तमाम पौधों की ज़िंदगी बन कर
खुद को एक विजेता की तरह देख रहा है।
                               ©अतुल कुमार यादव

Tuesday, 17 September 2019

दर्पण


दर्पणों के सामने खड़ा मैं
क्या कभी
उसकी सुधियों को चुन सकुँगा?

काश! अगर मैं दर्पण होता
तो पता है क्या करता?
पहले अपने आप को देखता।
जी भर कर निहारता
और फिर थोड़ा थोड़ा
अपने आप को लिखता।

कविता के बागानों से
चुन कर लाता
कुछ शब्द
कुछ अक्षर।
जिनके अर्थ
मोगरे जैसे
बालों की तरह होते,
वही मोगरे!
जो कविता के चुने शब्दों जैसे
खिल उठते हैं।

बादलों के शिलाखंड पर बैठकर
देखता अपने आप को
जहां मुझे देखकर
कोई पूछने वाला नहीं होता कि
मै अपने आप को
कविता में देख रहा हूँ,
या दर्पण में निहार रहा हूँ।
वहां न मेरी जाति पूछी जाती
न धर्म
और न ही मेरी उम्र।
क्युकी कविता का दर्पण का
अपना धर्म अपनी जाति
और अपनी खुद की उम्र है।

जानते हो?
और क्या क्या करता मै
नहीं न?
अरे! सिर्फ औे सिर्फ़ निहारता मै
इन अक्षर अक्षर से शब्द को
इन शब्द शब्द से वाक्य को
जो अपने आप में मुझको समेटे
इस रात के चांद को ही
भूल बैठें हैं।

जानते हो
दर्पण का कविता होना
या कविता का दर्पण होना
क्या होता है?
नहीं न?
अरे ये दोनों ही एक जैसे है,
जो खत्म करते है
मन के अन्दर छिपे काश को।
और दिखाते है हमें
हमारे सच का आईना..
अब कभी न कहूँगा
काश! मै दर्पण होता।।
    ©अतुल कुमार यादव

Saturday, 17 August 2019

जिन किस्सों को सुना सुनाकर

जिन किस्सों को सुना सुनाकर रात रात भर तुम्हें जगाया,
उन किस्सों में हमने अपनी कुछ पहचान छिपा रक्खी है।।

झूले  वाले  किस्से   का   मैं   झूला  झूल  नहीं   पाया  हूँ,
राजा रानी  वाला  किस्सा  अब  तक  भूल  नहीं  पाया हूँ,
झूले  वाले  किस्से का अब  तक कुछ  किरदार अधूरा  है,
राजा  रानी  वाला   किस्सा   होता  भी  तुम  पर  पूरा  है,
जिन्दादिल किस्सों में तुम हो  तुझमें जान छिपा रक्खी है,
जिन किस्सों को सुना सुनाकर रात रात भर तुम्हें जगाया,
उन किस्सों में हमने अपनी कुछ पहचान छिपा रक्खी है।।

जिसमें  केवल  तुम‌ ही  तुम  थी  वही कहानी तोल रहें हैं,
अनुभव  वाले  सभी   कथानक   झूठे   मेरे  बोल  रहे  हैं,
दीवारों ‌  में   कैद‌   हमारी   कल्प   भावना   टकराती   है,
इच्छायें  खुद  बाहर  आकर  मानों  तुम  सा  लहराती  है,
तुमने ख्वाबों की सिलवट पर अजब निशान छिपा रक्खी है,
जिन किस्सों को सुना सुनाकर रात रात भर तुम्हें जगाया,
उन किस्सों में हमने अपनी कुछ पहचान छिपा रक्खी है।।

इक  किस्से  में  लड़की  है  वो  लड़की  कुछ  अतरंगी है,
हँस-हँस‌‌ कर बातें  करती  है  कुछ चंचल कुछ सतरंगी है,
पहली बार मिला था उससे  या  किस्मत ने मिलवाया था,
बदले ‌  में   ही  दो   चार  कहानी   मैंने  उसे  सुनाया  था,
वही सयानी  लड़की  अब  तो‌  सारे  गान छिपा रक्खी है,
जिन किस्सों को सुना सुनाकर रात रात भर तुम्हें जगाया,
उन किस्सों में हमने अपनी कुछ पहचान छिपा रक्खी है।।

मेरे जीवन की कुलनिधि का सर्वविदित हर गाँव तुम्हीं हो,
जलने  वाली  हर  देहरी  का  इन्द्रधनुषी  छाँव  तुम्हीं  हो,
किस्से  सारे  सच  हैं  मेरे  सच  के  तो  संसार  तुम्हीं  हो,
कथा-कथानक  चीख  रहें हैं जिनके केवल सार तुम्हीं हो,
सिर्फ  तुम्हीं  हो  जिसमें  मैंने हर मुस्कान छिपा रक्खी है,
जिन किस्सों को सुना सुनाकर रात रात भर तुम्हें जगाया,
उन किस्सों में हमने अपनी कुछ पहचान छिपा रक्खी है।।
                                              ©अतुल कुमार यादव

Wednesday, 17 July 2019

रोटी

तवा  ठंडा  पड़ा  घर  का  नहीं  चकले  पे  है  रोटी,
न  हाथों  ने  गुँथा  आटा   नहीं  चुल्हे   पे   है  रोटी।

पिता से बोलते बच्चे  पिता जी  कुछ खिला दो अब,
लगी  है  भूख  जोरों  की   सितम  ढाने  पे  है  रोटी।

नयन  की  देख  लाचारी  द्रवित  होकर  पिता बोला,
ख़ुदा  हमको  उठा  ले  अब  तुली  खाने पे  है रोटी।

सुना  था  कल  ज़माने  से  ज़माने  को  चलाती  है,
ज़ुबा   ख़ामोश  है   मेरी   मेरे   काँधे   पे  है   रोटी।

तड़पती  आँख  बच्चों  की  नहीं  मैं  देख  पाता  हूँ,
ख़ुशी  बच्चों  की  लगती है ज़ुदा  करने  पे  है रोटी।

अलग  है  बात  रोटी  की  मयस्सर  भी नहीं है अब,
क़हर  बन  टूटने  को अब अतुल  जलसे पे है रोटी।।
                                        ©अतुल कुमार यादव

Monday, 17 June 2019

तुम गीतों में कब आवोगी?

शुन्य  पड़े  हैं  भाव  हमारे क्या उपमा  तुम दे पावोगी?
तुम हमको इतना बतला दो तुम गीतों में कब आवोगी?

जीवन में मधुमास न घोलों कविता में अहसास न घोलों,
अपनी सासें अपनी  है तो अधरों  में तुम प्यास न घोलों,
जीवन  में  कब  कैसे  आयी मन  को  मेरे  कैसे भायी,
पता नहीं है कुछ भी  मुझको  पूर्ण  करों मेरी सुनवायी,
सासों  में  तुमको भर लूँ मैं  क्या इतना हक़ दे पावोगी?
तुम हमको इतना बतला दो तुम गीतों में कब आवोगी?

ये अक्षर अक्षर  राह  देखतें  शब्द  प्रतिक्षित हो बैठें हैं,
गीत  ग़ज़ल औ  छन्द  हमारे  क्या  बतलाऊँ  कैसे  हैं,
ख़बर  सुनी  जब  से  आने की हम यादों में घूम रहें हैं,
कुछ  यादें  कुछ सपने लेकर निपट अकेले झूम रहें हैं,
सपनें  हमसे  पूछ  रहें  हैं  क्या आँखों में घुल पावोगी?
तुम हमको इतना बतला दो तुम गीतों में कब आवोगी?

मन  की  मेरे  निर्मल  पावन नेह भावना विचरित होगी,
भाषायें  सब  मौन  रहेंगी  इच्छायें  सब  मुखरित होगी,
मेरे  गीतों  को  पढ़कर  जब  दुनिया  नाम पता पूछेगी,
गीत  अधुरे  कुछ  लेकर  जब  केवल तुमको ही ढूढ़ेगी,
क्या उस हारी दुनिया को तुम अपना नाम बता पावोगी?
तुम हमको इतना बतला दो तुम गीतों में  कब आवोगी?

ये  गीत  हमारा  कल  तुमसे  सम्बन्धों  में  बध  जायेगा,
ये शब्द शब्द ये अक्षर अक्षर  ये सब तुझमें सध जायेगा,
कल  मैं  शायद  नहीं रहूँगा पर तुम ज़िन्दा रह जावोगी,
मेरे  गीतों  में  आकर  तुम  केवल  खुद को ही पावोगी,
अपने  अन्तर-मन  को बोलों तब उत्तर क्या दे पावोगी?
तुम हमको इतना  बतला दो तुम गीतों में कब आवोगी?
                                            ©अतुल कुमार यादव

Friday, 17 May 2019

घर अधूरा लग रहा है

घर  अधूरा  लग  रहा  है  भाव  मेरे  अनमने,
सूर्य  के  तुम  डूबते  ही घर चली आना प्रिये।

डगमगाती  नाव  मेरी  चल  रही  है  छोर  से,
बह न जाये ज़िन्दगी ये मन लहर को तोड़ के,
तुम सहारा  हो  हमारी  पास तुमको देखकर,
कसमसा केे रह गये  हैं कुछ अकेले सोचकर,
मुक्त बाहों में पड़े हैं कुछ अधर के सिलसिले,
सूर्य  के  तुम  डूबते ही  घर चली आना प्रिये।

अंग  आधा  हो   हमारी   हो   हमारी   देवता,
जग अभी तक आपकेे ही काँध पे तो है टिका,
देह  मेरी  मरुथली  है आपके  बिन  लग रही,
वक्त में जो नप गयी है  ज़िन्दगी तो सब सही,
चाहते हैं रात केे हम गाल पर कुछ लिख सके,
सूर्य  के  तुम  डूबते  ही  घर चली आना प्रिये।

मानता हूँ  ज़िन्दगी  की सीढ़ियाँ हैं अनगिनत,
आ गये नव द्विप में  हैं  मिल गयी है सल्तनत,
चाहतें  ही  मंज़िलोें  की  दूर  हमके कर गयी,
पल  पुराने  याद  आये आँख  मेरी  भर गयी,
दूर  होते  आपसे  ही  स्वर  हमारे  बिध  गये,
सूर्य  के  तुम  डूबते ही  घर चली आना प्रिये।

फासले  तो चाहते  हैं  फ़िर लिपटना प्यार से,
आँसुओं को पढ़  न पायेे आप हम स्वीकारते,
खिड़कियों पे आँख रक्खे वक्त हमसे खेलता,
प्राण भी अब  हाथ जोड़े कह रहा है  देवता!
लौट आओ द्वार तुम बिन हम अधूरे रह गये,
सूर्य  के  तुम  डूबते ही  घर चली आना प्रिये।
                                ©अतुल कुमार यादव

Wednesday, 17 April 2019

ऐ प्रिये! खुशियाँ मनाओ

नींव  हमने  जो  रखी  थी   बात   है   स्वीकार  की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

जिंदगी  की  दौड़  में   था   हारना  हमने  न  सीखा,
और जीवन में कभी  कुछ  त्यागना  तुमने न सीखा,
आज  घायल  कर्ण  सा मैं  गिर  गया  हूँ हार लेकर,
आँख  से  ओझल  चला  होने  तुम्हें  मैं  जीत देकर,
ईंट  रखनी   है   तुम्हें    ही   नेह    के  आधार   की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

आज का अर्जुन अकेला पथ भ्रमित कुछ हो गया है,
या  कहूँ  गाण्डीव रखकर  युद्ध  में खुद  सो गया है,
कृष्ण  जैसे  सारथी भी  अब  कहाँ मिलते जगत में,
जो  उसे   गीता   सुनाकर   बाँध   लेते   दृष्टिगत  में,
चन्द   सपने   जीत   के   थे,   रीत   है  ये  हार  की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

जीत मन की हो गई है  या  अभी या संकोच मन में,
या  हिलोरे  ले  रहा   है   कौरवों  सा  क्रोध  तन  में,
जीतना  गर  ध्येय   है  तो  पाण्डवों  सा  धैर्य  धारों,
या नहीं  तो  द्रोपदी  बन कृष्ण  को  फिर से पुकारो,
वो   कहानी   जीत   की   है   ये  कहानी   हार  की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

मोह  माया  में  फँसी  है  हर  प्रणय  की जीत मानो,
व्यर्थ ही  अब  हार  मानों  व्यर्थ  ही  हर जीत जानो,
सर्व हितकर त्याग  मानो  त्याग  में खुशियाँ छुपी है,
त्यागना जिसने  न  सीखा  आज जग में वो दुखी है,
भीष्म  सा  संकल्प  कर  लो  शौर्य  के  विस्तार की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।।
                                       ©अतुल कुमार यादव

Sunday, 17 March 2019

चलो सभ्यता के नये गीत गाए।

गुनगुनाती रही गीत आँगन की कलियाँ,
चलो   सभ्यता    के   नये   गीत   गाए।

सरल  श‌ब्द  मानो  सरल  व्याकरण  है,
गाँव में शाम  का  इक  नया आवरण है,
गाँवों  में  मंदिर   और   मंदिर  में  पूजा,
चलो थाल  पूजा  की  फिर  हम सजाए,

चलो सभ्यता के.......।

झुर - झुर  बहे   पुरुवा   पनघट  किनारे,
बात  पानी  में  करते   हैं  चन्दा  सितारे,
दीपों की लड़ियाँ और गीतों की कड़ियाँ,
चलो   गाँव   से   हम   शहर  में  लुटाए,

चलो सभ्यता के.......।

©अतुल कुमार यादव

Sunday, 17 February 2019

प्रथम विलाप थकन मत देखो

प्रथम विलाप थकन मत देखो तजकर आगे बढ़ जाऊँगा,
हारा हुआ  मुझे  मत  समझो  जीत साथ लेकर आऊँगा।

स्वागत  करना  था  सावन  का लेकिन मैं लाचार हुआ हूँ,
नश्वरता में  खोकर अब  तो  जीवन  की  पतवार हुआ हूँ।
छूट  गये   हैं   भाव   हमारे  टूट   गयी   हैं   अभिलाषायें,
मन  की  पीड़ा  तड़प  रही है मन की पीड़ा किसे सुनायें?
सपनों  को  मैं  साध  चुका  हूं  अहसासों में सध जाऊँगा,
हारा  हुआ  मुझे  मत   समझो जीत साथ लेकर आऊँगा।।

वेद  पुराण  धर्म  सब   झूठे   खाली  हाथ  बढ़ा  पाया  हूँ,
मन  मंदिर  के  देवों  को  मैं  केवल  अश्रु  चढ़ा  पाया  हूं।
टूट  टूट  कर   रहा   बिखरता   बूदों  के  जैसे  जुड़ता  हूँ,
वैरागी  मन  अपना  लेकर  विस्मृतियों  में  ही  मुड़ता  हूँ।
चिन्तन  मंथन  ग्रंथन  में  अब अपना समय लगा पाऊँगा,
हारा  हुआ  मुझे  मत  समझो  जीत साथ लेकर आऊँगा।।

जीवन  की  खेती  में  अब  तक  हमने  तो  आँसू  बोये हैं,
संघर्षों  की   यादों   में   ही   अपने   पॉवों   को  धोये  हैं।
आँसू  पीड़ा  आहों  में   अब   हमने  दहना  सीख   लिया,
अभिशापों  को  गले  लगाकर  हमने  रहना  सीख  लिया।
परम्परा  औ   रिश्ता  क्या  है ?   बन्धन  में  बध  जाऊँगा,
हारा  हुआ  मुझे   मत  समझो  जीत साथ लेकर आऊँगा।।

अरमानों  की  गठरी  बाँधें  मानों  पॉव  निकल  पड़ते  हैं,
खुद  को  पाने  की  चाहत  में  पॉव  हमारे  चल पड़ते हैं।
थकी  कल्पना   टूटे   सपने  राहों   में  शामिल  हो   जाते,
शोर   मचाते  सन्नाटों  में   कदम   हमारे  ठहर   न   पाते।
जीवन  की  मुश्किल राहों पर कदम बढ़ा तो बढ़ जाऊँगा,
हारा  हुआ  मुझे  मत  समझो  जीत साथ लेकर आऊँगा।।
                                                 ©अतुल कुमार यादव

Thursday, 17 January 2019

प्रेम की शब्दावली से

प्रेम  की   शब्दावली  से   नेह  जब  भी  खो  गया   था,
प्रीति  की  पावन  धरा   पर  प्रेम  से  मैं  सो   गया  था।

मैं  अकेला  चल  रहा   था   रौशनी  की  आस  लेकर,
सूर्य  जब  धूमिल  हुआ  था  हौसले  की  प्यास लेकर, 
चाँदनी तब  बढ़ रही  थी  चाँद  को  खुद  साथ  लेकर,
ख़्वाब भी  उगने  लगे  थे  ख़्वाब  को खुद  हाथ लेकर,
आप   की  बातों  में  आकर  आपका  मैं  हो  गया   था,
प्रीति  की   पावन  धरा  पर  प्रेम  से  मैं  सो  गया   था।

जब मिला तब  खिल उठा था प्रेम अपना मीत  में कल,
ख़्वाब  का  हर  पल  उधेड़ा  जा रहा था  गीत में  कल,
प्रीति  का  हर  अर्थ   ढूढ़ा  जा  रहा   था  रीत  में  कल,
दर्द   का  हर  भाव  देखा   जा  रहा  था   प्रीत  में  कल,
देख   कर   इस   वेदना   को   दर्द    मेरा   रो  गया  था,
प्रीति  की  पावन  धरा  पर  प्रेम   से  मैं   सो  गया   था।

मर  गयी  है   भावना  अब   मर  गयी  है  कल्पना  भी,
ज्योत्सना  भी  मर  गयी   है  मर  गयी  है  कामना भी,
क्युँ  करूँ  फिर  साधना  मैं क्युँ  करूँ  अब अर्चना भी,
मर   गयी    है   वेदना   अब   मर   गयी   संवेदना  भी,
चूम  कर  खुद  की   हथेली  चेतना  में  खो  गया  था,
प्रीति  की  पावन  धरा  पर   प्रेम  से   मैं  सो  गया  था।

बोल  कैसे   नष्ट  कर  दूँ  जो  लिखा  हूँ  दर्द  सहकर,
भाव  कैसे  वो  मिटा  दूँ  जो  लिखा  हूँ  आज  तपकर,
अर्थ की  मैं  किस  नदीं  में  जा  रहा  हूँ  आज बहकर,
खुश रहो तुम इस धरा पर नेह का इक नीड़  बनकर,
साथ  में  रहकर  सभी  के  प्रेम   को  मैं  पो  गया  था,
प्रीति  की  पावन  धरा  पर  प्रेम   से  मैं  सो  गया  था।।
                                            ©अतुल कुमार यादव