ग़ज़ल غزل
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आँख में कुछ रात लेकर लौट आये,
अब्र की बरसात लेकर लौट आये।
काँच के कुछ ख़्वाब पलकों पर सजे थे,
वक़्त ए लम्हात लेकर लौट आये।
उम्र से बढ़कर तमन्ना उम्र से क्या?
ज़िंदगी जज्बात लेकर लौट आये।
चाहते थे हम दिखाना दस्तरस दिल,
दर्द दिल हज़रात लेकर लौट आये।
और ग़ुजरी शब कभी आनी नहीं थी,
उम्र ए दिन रात लेकर लौट आये।
बुझ गये जलते मसाइल आज दिल में,
बा-ख़ुदा औक़ात लेकर लौट आये।
बे-वुज़ू होकर 'अतुल' तो रू-ब-रू है,
बस हम्ही सह-मात लेकर लौट आये।।
©अतुल कुमार यादव
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आँख में कुछ रात लेकर लौट आये,
अब्र की बरसात लेकर लौट आये।
काँच के कुछ ख़्वाब पलकों पर सजे थे,
वक़्त ए लम्हात लेकर लौट आये।
उम्र से बढ़कर तमन्ना उम्र से क्या?
ज़िंदगी जज्बात लेकर लौट आये।
चाहते थे हम दिखाना दस्तरस दिल,
दर्द दिल हज़रात लेकर लौट आये।
और ग़ुजरी शब कभी आनी नहीं थी,
उम्र ए दिन रात लेकर लौट आये।
बुझ गये जलते मसाइल आज दिल में,
बा-ख़ुदा औक़ात लेकर लौट आये।
बे-वुज़ू होकर 'अतुल' तो रू-ब-रू है,
बस हम्ही सह-मात लेकर लौट आये।।
©अतुल कुमार यादव
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