Wednesday, 17 April 2019

ऐ प्रिये! खुशियाँ मनाओ

नींव  हमने  जो  रखी  थी   बात   है   स्वीकार  की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

जिंदगी  की  दौड़  में   था   हारना  हमने  न  सीखा,
और जीवन में कभी  कुछ  त्यागना  तुमने न सीखा,
आज  घायल  कर्ण  सा मैं  गिर  गया  हूँ हार लेकर,
आँख  से  ओझल  चला  होने  तुम्हें  मैं  जीत देकर,
ईंट  रखनी   है   तुम्हें    ही   नेह    के  आधार   की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

आज का अर्जुन अकेला पथ भ्रमित कुछ हो गया है,
या  कहूँ  गाण्डीव रखकर  युद्ध  में खुद  सो गया है,
कृष्ण  जैसे  सारथी भी  अब  कहाँ मिलते जगत में,
जो  उसे   गीता   सुनाकर   बाँध   लेते   दृष्टिगत  में,
चन्द   सपने   जीत   के   थे,   रीत   है  ये  हार  की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

जीत मन की हो गई है  या  अभी या संकोच मन में,
या  हिलोरे  ले  रहा   है   कौरवों  सा  क्रोध  तन  में,
जीतना  गर  ध्येय   है  तो  पाण्डवों  सा  धैर्य  धारों,
या नहीं  तो  द्रोपदी  बन कृष्ण  को  फिर से पुकारो,
वो   कहानी   जीत   की   है   ये  कहानी   हार  की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।

मोह  माया  में  फँसी  है  हर  प्रणय  की जीत मानो,
व्यर्थ ही  अब  हार  मानों  व्यर्थ  ही  हर जीत जानो,
सर्व हितकर त्याग  मानो  त्याग  में खुशियाँ छुपी है,
त्यागना जिसने  न  सीखा  आज जग में वो दुखी है,
भीष्म  सा  संकल्प  कर  लो  शौर्य  के  विस्तार की,
ऐ  प्रिये !  खुशियाँ  मनाओ  जीत  के  उपहार  की।।
                                       ©अतुल कुमार यादव

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