Thursday, 17 January 2019

प्रेम की शब्दावली से

प्रेम  की   शब्दावली  से   नेह  जब  भी  खो  गया   था,
प्रीति  की  पावन  धरा   पर  प्रेम  से  मैं  सो   गया  था।

मैं  अकेला  चल  रहा   था   रौशनी  की  आस  लेकर,
सूर्य  जब  धूमिल  हुआ  था  हौसले  की  प्यास लेकर, 
चाँदनी तब  बढ़ रही  थी  चाँद  को  खुद  साथ  लेकर,
ख़्वाब भी  उगने  लगे  थे  ख़्वाब  को खुद  हाथ लेकर,
आप   की  बातों  में  आकर  आपका  मैं  हो  गया   था,
प्रीति  की   पावन  धरा  पर  प्रेम  से  मैं  सो  गया   था।

जब मिला तब  खिल उठा था प्रेम अपना मीत  में कल,
ख़्वाब  का  हर  पल  उधेड़ा  जा रहा था  गीत में  कल,
प्रीति  का  हर  अर्थ   ढूढ़ा  जा  रहा   था  रीत  में  कल,
दर्द   का  हर  भाव  देखा   जा  रहा  था   प्रीत  में  कल,
देख   कर   इस   वेदना   को   दर्द    मेरा   रो  गया  था,
प्रीति  की  पावन  धरा  पर  प्रेम   से  मैं   सो  गया   था।

मर  गयी  है   भावना  अब   मर  गयी  है  कल्पना  भी,
ज्योत्सना  भी  मर  गयी   है  मर  गयी  है  कामना भी,
क्युँ  करूँ  फिर  साधना  मैं क्युँ  करूँ  अब अर्चना भी,
मर   गयी    है   वेदना   अब   मर   गयी   संवेदना  भी,
चूम  कर  खुद  की   हथेली  चेतना  में  खो  गया  था,
प्रीति  की  पावन  धरा  पर   प्रेम  से   मैं  सो  गया  था।

बोल  कैसे   नष्ट  कर  दूँ  जो  लिखा  हूँ  दर्द  सहकर,
भाव  कैसे  वो  मिटा  दूँ  जो  लिखा  हूँ  आज  तपकर,
अर्थ की  मैं  किस  नदीं  में  जा  रहा  हूँ  आज बहकर,
खुश रहो तुम इस धरा पर नेह का इक नीड़  बनकर,
साथ  में  रहकर  सभी  के  प्रेम   को  मैं  पो  गया  था,
प्रीति  की  पावन  धरा  पर  प्रेम   से  मैं  सो  गया  था।।
                                            ©अतुल कुमार यादव

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