Wednesday, 17 July 2019

रोटी

तवा  ठंडा  पड़ा  घर  का  नहीं  चकले  पे  है  रोटी,
न  हाथों  ने  गुँथा  आटा   नहीं  चुल्हे   पे   है  रोटी।

पिता से बोलते बच्चे  पिता जी  कुछ खिला दो अब,
लगी  है  भूख  जोरों  की   सितम  ढाने  पे  है  रोटी।

नयन  की  देख  लाचारी  द्रवित  होकर  पिता बोला,
ख़ुदा  हमको  उठा  ले  अब  तुली  खाने पे  है रोटी।

सुना  था  कल  ज़माने  से  ज़माने  को  चलाती  है,
ज़ुबा   ख़ामोश  है   मेरी   मेरे   काँधे   पे  है   रोटी।

तड़पती  आँख  बच्चों  की  नहीं  मैं  देख  पाता  हूँ,
ख़ुशी  बच्चों  की  लगती है ज़ुदा  करने  पे  है रोटी।

अलग  है  बात  रोटी  की  मयस्सर  भी नहीं है अब,
क़हर  बन  टूटने  को अब अतुल  जलसे पे है रोटी।।
                                        ©अतुल कुमार यादव

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