मैं जिंदगी जीने की चाहत लिए
पूरी जिंदगी जी चुका हूँ।
एक मदारी की तरह
तमाम करतब दिखा चुका हूँ
या फिर जुआरी की तरह
अपनी पूरी कमाई लुटा चुका हूँ।
मगर अब जिंदगी चाहती है
फिर से अपने दायित्वों का बोझ
उठाने के काबिल बनूँ।
फिर से मेरी जिंदगी का सफ़र
निर्बाध और सरल हो।
और मैं एक विजेता की तरह
इस दुनिया से विदा हो जाऊँ।
लेकिन इस जिंदगी को
ये नहीं पता है कि
जिससे वह सारी उम्मीद लिए है
वो इक उस ठूंठ वृक्ष की तरह है
जिस पर न पल लगेंगे,
और न ही वह छाया दे सकता है।
क्योंकि वह अपनी
पूरी जिंदगी काट चुका है
और खु़शी-खु़शी इस जमाने से
विदा होने की चाहत लिए
जिंदगी के आखिरी पल गिन रहा है।
ज़िंदगी जिसको इक विजेता की तरह
विदा करना चाहती है
वह ख़ुद
अपने लहू के इक इक कतरे को
इस जमी में सींच कर
तमाम वृक्षों के उगने की संभावनाएँ लिए
तमाम पौधों की ज़िंदगी बन कर
खुद को एक विजेता की तरह देख रहा है।
©अतुल कुमार यादव
पूरी जिंदगी जी चुका हूँ।
एक मदारी की तरह
तमाम करतब दिखा चुका हूँ
या फिर जुआरी की तरह
अपनी पूरी कमाई लुटा चुका हूँ।
मगर अब जिंदगी चाहती है
फिर से अपने दायित्वों का बोझ
उठाने के काबिल बनूँ।
फिर से मेरी जिंदगी का सफ़र
निर्बाध और सरल हो।
और मैं एक विजेता की तरह
इस दुनिया से विदा हो जाऊँ।
लेकिन इस जिंदगी को
ये नहीं पता है कि
जिससे वह सारी उम्मीद लिए है
वो इक उस ठूंठ वृक्ष की तरह है
जिस पर न पल लगेंगे,
और न ही वह छाया दे सकता है।
क्योंकि वह अपनी
पूरी जिंदगी काट चुका है
और खु़शी-खु़शी इस जमाने से
विदा होने की चाहत लिए
जिंदगी के आखिरी पल गिन रहा है।
ज़िंदगी जिसको इक विजेता की तरह
विदा करना चाहती है
वह ख़ुद
अपने लहू के इक इक कतरे को
इस जमी में सींच कर
तमाम वृक्षों के उगने की संभावनाएँ लिए
तमाम पौधों की ज़िंदगी बन कर
खुद को एक विजेता की तरह देख रहा है।
©अतुल कुमार यादव
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