Monday, 17 December 2018

नया दरिया नया साहिल नया मंजर दिखाएगा

नया दरिया नया  साहिल  नया  मंजर  दिखाएगा,
हमारी  राह   का   पत्थर   हमें   ऊंचा  उठाएगा।

अगर जो प्यार है  तो  प्यार  का एहसास होने दे,
तकाजा कुछ पलों  का  ज़िंदगी में खास होने दे,
दिखेगा इश्क़  का  सदका नज़र के पास होने दे,
मिटेंगे   फासले    सारे   ज़रा  विश्वास  होने   दे,
यही विश्वास सपनों को हकीक़त कर दिखाएगा,
हमारी  राह   का   पत्थर   हमें   ऊंचा  उठाएगा।

नज़र  भी  बात  करती  है  नज़र से बात होने दे,
ज़मीं  पर  आँख  से  मेरे  कभी  बरसात  होने दे,
दिखेगा  आँख  में  जुगनू  ज़रा  सी  रात  होने दे,
कहेगी  सच  निगाहे  फिर  सही  हालात  होने दे,
सही हालात  का  जुगनू  कभी दुनिया सजाएगा,
हमारी  राह   का   पत्थर   हमें   ऊंचा  उठाएगा।

हुआ है  जो  नहीं  अब तक  उसे तू आज़ होने दे,
परिंदा  हूं   नया  मैं   तो  नयी   परवाज़   होने  दे, 
मुकद्दर  राज़  है  तो  तू   इसे  बस  राज़  होने  दे,
मिलेगी  हर  नई  मंजिल  सही  आगाज़  होने  दे,
सही आगाज़ ही  एक  दिन  बुलंदी पर बिठाएगा,
हमारी  राह   का   पत्थर   हमें   ऊंचा  उठाएगा।

अभी  शुरुआत  मेरी   है  मुझे   नाकाम  होने  दे,
अकेला  छोड़  दे  मुझको  मुझे  बदनाम  होने दे, 
मुहब्बत  है  इनायत  तो  मुहब्बत  आम  होने  दे,
लिखेंगे फिर ग़ज़ल तुम पर  हँसी वो शाम होने दे,
हँसी उस  शाम  की  गजलें  जमाना साथ गाएगा,
हमारी  राह   का   पत्थर  हमें    ऊंचा  उठाएगा।
                                    ©अतुल कुमार यादव

Saturday, 17 November 2018

चाँद अब तक नभ में बैठा

चाँद अब तक  नभ  में  बैठा  लाल सूरज हो चला है,
दीप  अपनी  रौशनी  भी  इस  जगत में खो चला है।।

रात  में  इक  चाँदनी   मन   को  हमारे  भा  रही  थी,
रात की  ही  चाँदनी  वो  गीत  मन  का  गा  रही  थी,
गीत  में  खोया  हुआ  मन  रात   को  ही  भूल  बैठा,
भोर के  आलोक  में  अब  रूप  चन्दा  खो  चला  है,
चाँद अब तक  नभ  में  बैठा  लाल सूरज हो चला है।

गीत  में    कुछ   वेदनाएँ    भावनाएँ   बह   रही   थी,
अनगढ़े सब  बिम्ब  लेकर आँख सच को कह रही थी,
वक्त की दहलीज़ पर कुछ घाव मन का रख दिया था,
अब  वही  उपमान  जीवित  दर्द  मन  में  बो चला है,
चाँद अब तक  नभ  में  बैठा  लाल सूरज हो चला है।

चाँद के  चेहरे  की चमचम  अब  नदी भी खा गयी है,
लाल सूरज  लालिमा  लेकर  सुबह  खुद  आ गयी है,
शीत  इस  मानस  पटल   पर  वेदनाएँ  खुद  बिखेरी,
मौन  सांकल  आँसुओं  के  पीर  को बस धो चला है,
चाँद अब तक  नभ  में  बैठा  लाल सूरज हो चला है।

कारवां  इन  आँसुओं  का  आँख में कब तक रुका है,
रक्त  मानो  देह में  हिमखण्ड  सा  अब  जम चुका है,
पीर  की  दुनिया  बड़ी  छल द्वेष  के दम पर खड़ी है,
दम्भ  भरता  है  ह्रदय  जो अंत  में खुद  रो  चला  है,
चाँद अब तक  नभ  में  बैठा  लाल सूरज हो चला है।
                                          ©अतुल कुमार यादव

Wednesday, 17 October 2018

ज़िंदगी की धार में हम

ज़िंदगी की  धार में  हम  नाव  बनकर  चल रहे हैं,
छोर के किस ओर  जाकर  हम  लगेंगे ये बता दो।

अनगिनत  लहरें  पड़ी  हैं  अनगिनत  दुश्वारियां हैं,
अनगिनत  है  मोड़  इसमें  अनगिनत  तैयारियां हैं,
बेख़बर  हैं   साहिलों  से  बेख़बर   है  आधियों  से,
हौसलों  को  साधने  हम  चल  पड़े  खुद्दारिओं  से,
जिंदगी   के   इस  भँवर  में  दूर  सबसे  हो  रहे  हैं,
छोर के  किस ओर  जाकर   हम  लगेंगे ये बता दो।

नाव  अपनी  डगमगाती क्युँ  भला  मझधार में है,
जब उजाला  पास है तो  क्युँ  तिमिर  संसार में है,
हम तिमिर को दूर  करने  का लिए संकल्प मन में,
सूर्य को  चल  खीच  लाएँ  जिंदगी के आचमन में,
पाँव  बढ़ते  पूछते  हैं  क्या  सुपथ  पर  बढ़ रहे हैं,
छोर के  किस ओर  जाकर  हम  लगेंगे  ये बता दो।

मैं अकेला  एक  राही  दर बदर  भटका  किया  हूं,
ज्योत  जिसकी बुझ गई  है प्रेम का  मैं वो दिया हूँ,
धार में गर तुम  फंसे  तो तब  तुम्हें  एहसास  होगा,
जीतना  इस  ज़िंदगी  से  है  कठिन  विश्वास होगा,
धूप  बढ़ती  जा  रही  है  धार  में  हम  जल  रहे हैं,
छोर के  किस ओर  जाकर  हम  लगेंगे  ये बता दो।

अजनबी थे जब मिले  थे  अजनबी फिर हो गए हैं,
ज़िंदगी  के कुंभ  में  हम  लग  रहा  है  खो  गए  हैं,
पीर मन की तब मुखर हो गीत मन के लिख रही है,
लेखनी  अतिरेक  होकर तन  सरीखा  दिख रही है,
आह  की  इन  सिसकियों  में रास्ते  गुम  हो  रहे हैं,
छोर के  किस  ओर  जाकर  हम  लगेंगे  ये  बता दो।।
                                           © अतुल कुमार यादव

Monday, 17 September 2018

कभी पेड़ पर बैठी चिड़िया

कभी पेड़ पर बैठी चिड़िया मुझको धीरज देती है।
कभी सुनाकर गीतों को मन की पीड़ा हर लेती है।।

कभी उसे मैं चुग्गा देता,
कभी उसे मैं सहलाता हूँ।
कभी कभी मैं व्याकुल होकर,
उसे ढूढ़ने लग जाता हूँ।
अद्भुत उसका सम्मोहन है,
अन्तर-मन को छू लेता है।
तूफानों से उसका लड़ना,
मुझको साहस दे देता है।
फुदक फुदक कर चलती है तो साहस मन भर देती है।
कभी सुनाकर गीतों को मन की पीड़ा हर लेती है।।

तिनका-तिनका चुन कर लाती,
सुन्दर सा है नीड़ बनाती।
उसी नीड़ में बैठी चिड़िया,
सही कहानी हमें सुनाती।
देख सून कर उसकी बातें,
मैं खुद विह्वल हो जाता हूँ,
उसके सपने उसकी हिम्मत,
देख सदा मैं चल पाता हूँ।
उसको पंखों की ताकत अब मुझको हिम्मत देती है।
कभी सुनाकर गीतों को मन की पीड़ा हर लेती है।।

पतझड़ में पत्ते गिर जाते,
पेड़ों की टहनी दिखती है।
उस टहनी पर देख घरौंदा,
मेरे मन पीड़ा उठती है।
घर उसका ना बिछड़े उससे,
कुछ सपने पलने लगतें हैं।
उस चिड़िया के लिए आँख से,
आँसू तक झरने लगतें हैं।
आखों के आँसू की धारा मन को घायल कर देती है।
कभी सुनाकर गीतों को मन की पीड़ा हर लेती है।।

सतरंगी अतरंगी जीवन,
पतझड़ बनकर आता जाता।
चिड़ियों के मन को छूकर ही,
अक्सर नीर नयन बरसाता।
धानी-धानी चूनर लेकर,
अगला पल है मन हरषाता।
पेड़ पात पर नजर पड़ी तो,
छोटा बच्चा उधम मचाता।
देख नीड़ में छोटा बच्चा चिड़ियाँ खुश हो लेती है।
कभी पेड़ पर बैठी चिड़िया मुझको धीरज देती है।।
                                         ©अतुल कुमार यादव

Friday, 17 August 2018

बिटिया का वर

बढ़ी  गरीबी  चढ़ी  उधारी  केवल  नाखून  नोंच  रहे  हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

गाँव नगर औ शहर शहर में  कोई  फर्क नहीं दिखता है,
कोसों  दूर  भले  हो  जाना  मानो  अब तो घर लगता है,
धारायें  विपरीत  हुयीं  सब  बाबूजी  का  मन  कहता है,
थके हार कर शाम ढले भी  घर आना बोझिल लगता है,
बिटिया के  सम्मुख  जाने  से  पहले  आंसू  पोंछ  रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

आंखों में बिटिया की   चिंता   इनमें  नींद कहां आती है,
अम्मा  भी  चिंता में  डूबी   पल   भर चैन कहां पाती है,
रोज   रोज  की   बातें   सारी  रोज  रोज  मिट जाती है,
विश्वासों   की  गठरी   देखों   कितना  नाच   नचाती है,
दिन भर दौड़ दौड़ कर अब तो बिटिया घर खोज रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

पीड़ायें  कितनी  दुखदायी  उर  में बस छलका करती हैं,
आहें भी बाबू के दिल की  अब तो घुट घुट कर मरती हैं,
अपनी  निर्धनता  लाचारी  के  दुखड़े  वो  किसे  सुनायें,
उद्वेलित  उत्कंठा  मन  की  घर  में  कैसे  आज दिखायें,
अभी  पसीना  माथे  का  वो  खुद  कपड़े में पोंछ रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।

अपने अरमानों का  सौदा  मुश्किल  होता  है कर पाना,
होता अक्सर  पीड़ादायी  बिटिया  का घर से घर जाना,
जीवन  की  यह  रीत  बड़ी  है  इसको  यहीं निभाना है,
भीगी आंखों से  बिटिया  का  इक  दिन बोझ उठाना है,
कहाँ किधर कब कैसे निकलें मन ही मन में सोच रहे हैं,
बिन चप्पल में बाबूजी अब बिटिया का वर खोज रहे हैं।
                                              ©अतुल कुमार यादव

Tuesday, 17 July 2018

मौन खुद से त्याग कर

मौन खुद से त्याग कर, बैराग मन में साध कर,  जब
काँपते  हो  स्वर  हमारे  बोल  कर  मैं  क्या  करूंगा।

भाव   विह्वल   हो   रहे   संवेदनाएँ   छल   रही   है,
अनकही  है  बात  मन  की  कल्पनाएँ  पल  रही  है,
कल्पनाओं के जिगर  में  मैं  उतर कर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे  बोल कर मैं क्या करूंगा।

शुन्य  निर्जन  चीड़  वन  से  पार  लाना  है  तुम्हें  ही,
लक्ष्य  कितना  दूर  है  यह  भी  बताना  है  तुम्हें  ही,
प्रीत की सहमी ऋचाएँ आज पढ़ कर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे  बोल कर मैं क्या करूंगा।

एक कदम पर फूल है तो एक कदम पर शूल बिखरे,
शब्द कुछ अहसास बन के पास मन के याद निखरे,
चुम्बिनी अनुभूतियों में आज जल कर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे  बोल कर मैं क्या करूंगा।

नेह  के   अनुबंध   फीके   प्रेम  के   जंगल  निरेखो,
शुचि  पत्रों  में  कभी  जीवन-मरण  को तुम टटोलो,
पुण्य  पापों  में  दहा  हूं  और  दहकर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे बोल कर मैं क्या करूंगा।
                                          ©अतुल कुमार यादव

Sunday, 17 June 2018

भीड़ में प्रियतम तुम्हारे गीत

भीड़  में  प्रियतम   तुम्हारे   गीत   गाये  जा  रहा  हूँ,
प्यार  के  अहसास  के  दीपक  जलाये  जा  रहा  हूँ।

बेदखल  है   नींद   मेरी   ख़्वाब   झूठे  गढ़   रहा   हूँ,
ख्वाहिशों को  मारकर  मैं  बस  तुम्हें  ही  पढ़ रहा हूँ,
दर्द  बिल्कुल अनसुना  है  आंसुओं  का  धड़  रहा हूँ,
धड़कनों  का  साथ  पाकर  आज  आगे  बढ़  रहा हूँ,
लौटकर  फिर  दूर  से  मैं  पास  तुम  तक आ रहा हूँ,
प्यार  के  अहसास  के  दीपक  जलाये  जा  रहा  हूँ।

मुश्किलों   में   ज़िंदगी   है   ज़िंदगी   में  जान  है  तू,
भाग्य की बदली  दिशा  है  वक्त  की  पहचान  है  तू,
धूप  से  हमको   बचाती   छाँव   से  अन्जान  है  तू,
और  धुँधली  सलवटों  पर  रोशनी  की  शान  है  तू,
ज़िंदगी  की  डोर  थामे   बस   तुम्हें  ही  गा  रहा  हूँ,
प्यार  के  अहसास  के  दीपक  जलाये  जा  रहा  हूँ।

बैठकर  पैगाम  लिख  दूँ  ज़िंदगी  के  नाम  लिख  दूँ,
भाग्य  की  सीढ़ी  लगाकर जीत का अंज़ाम लिख दूँ,
जो  अधूरी  रह  गई  है  राह  की  हर  आस  लिख दूँ,
शुष्क मरुथल जो पड़ी है जीत की हर प्यास लिख दूँ,
ज़िंदगी  के  मोड़  पर   अब  ठोकरें  ही  खा  रहा  हूँ,
प्यार  के  अहसास  के  दीपक  जलाये  जा  रहा  हूँ।

पूर्ण   होकर   भी   अधूरी   रह   गई   है   जीत  मेरी,
और  विरहन  लग  रही   है   ज़िंदगी  की  प्रीत  मेरी,
चंद  कदमों   को   बढ़ाकर    काटनी  है   रात   मेरी,
अब   बुलन्दी   तक   चलेगी   देखना  हर  बात  मेरी,
सुलझनों  की  जीत में  मैं  बस  तुम्हें  ही पा  रहा  हूँ,
प्यार  के  अहसास  के  दीपक  जलाये  जा  रहा  हूँ।।
                                           ©अतुल कुमार यादव

Thursday, 17 May 2018

कल्पित मन में सपने लेकर

कल्पित  मन  में  सपने  लेकर  हम  सपनों  में अब खो  जाए,
तुम  आधा  हो  मैं  आधा  हूँ   चलो  एक  मिलकर  हो  जाए।

बहुत  समय  से  मिले  नहीं  हैं   मिलने  की  यह  तत्परता  है,
समय  अभी  तक रुका  हुआ है  पल पल  मन आहे भरता है,
मेरे   जीवन   की   सरिता   में   परिवर्तन   की  राह   रही  हो,
मेरे  सपनों  में  मंजिल  थी  मंजिल   की  तुम   चाह  रही  हो,
खुशियों  के  मन  दीप ‌जले  हैं  बुझकर  जाने‌ कब  खो  जाए,
तुम  आधा  हो  मैं  आधा  हूँ   चलो  एक‌  मिलकर  हो  जाए।

बैठे  -  बैठे   ऊघ    रहा    हूँ     मैं    यादों   की‌  अमराई  ‌ में,
कितने   रिश्ते  बिखर   गए  हैं  इन‌   रिश्तों   की   तुरपाई  में,
पीड़ा  के  अहसास   छिपे   हैं   बस   सागर‌  की   गहराई  में,
खुशियों  के  पैगाम  भरे‌  हैं   इस   जीवन   की   शहनाई   में,
प्रेम  अधूरा  तुम   बिन   मेरा   चलो   प्रेम   के   गीत   सुनाए,
तुम  आधा  हो  मैं  आधा  हूँ   चलो  एक  मिलकर  हो  जाए।

रात  सुहानी  है  ख्वाबों  की   बस  आकर  हमें  जगाना  मत,
शीश   धरे   बैठो   कंधे   पर  भोलापन  तुम  दिखलाना  मत,
जीवन  भर  खुशियाँ  पाने  को कल  फिर से  उपवास रखूंगा,
फिर जीवन के इक-इक पल का जीवित हर अहसास लिखूंगा
जीवन  में  कल्पित  सपने  सब  ना  जाने  ये  कब  खो  जाएं,
तुम  आधा  हो  मैं  आधा  हूँ  चलो  एक  मिलकर  हो  जाए।

हाथ  बाँध  कर  क्यों  बैठी   हो  बोलो  क्या  क्या  मजबूरी है,
साथ   हमेशा   चलो   हमारे   अब   कैसी   दिल   में   दूरी  है,
निश्छल  अपना  प्रेम  रहा  है  तुम  जग को  इतना बतला दो,
प्रेमभाव  बनकर  कविता  में  बस  आकर  इतना दिखला दो,
इक  प्रतिबिंब  बनो   तुम   मेरा  दर्पण  खंड - खंड  हो  जाए,
तुम  आधा  हो  मैं  आधा  हूँ  चलो  एक  मिलकर  हो जाए।।
                                                      ©अतुल कुमार यादव

Tuesday, 17 April 2018

ग़ज़ल : बज़्म-ए-अहबाब के कुछ यूँ फ़साना हो गयें हैं

बज़्म-ए-अहबाब के कुछ यूँ फ़साना हो गयें हैं,
आज ख़ुद के पास बैठे हम ज़माना हो गयें हैं।

इश्क़-ए-जज्बात सारे ग़मज़दा है इस तरह से,
जिस तरह ख़ामोश होकर खुद निशाना हो गयें हैं।

ख़्वाब भी झड़ने लगे हैं बाजुओं को छोड़ के अब,
फूल जैसे डालियों से अब रवाना हो गयें हैं।

चल रहे हैं साथ मेरे गर नज़ारे आप बन के,
सच कहूँ तो आप जीने का बहाना हो गयें हैं।

जी बहलता है अतुल का आपकी ही महफिलों में,
क़ाफ़िला ग़म का हमारे अब फ़साना हो गयें हैं।।
                                       ©अतुल कुमार यादव

Saturday, 17 March 2018

कविता : काठ का पुतला

कुछ दर्द है दबा हुआ
जो कुछ देर के लिए
बाहर आना चाहता है,
सीने के दरवाजे को
धीरे से खोलता है
बाहर को झांकता है,
चोर नज़र से कभी
दायें देखता है तो
कभी बायें देखता है
कभी ऊपर नीचे तो
कभी आगे पीछे...।
फिर चुपके से
पार करना चाहता है
उस दहलीज को
जो उसे कैद कर के
रखे हुए है।
कभी कभी उस कैद से
बाहर निकल जाता है
पर दहलीज़ के बाहर
कदम रखते ही
उसे बयां होने को
न तो शब्द मिलता है
और न तो भावनाएँ,
न तो आधार मिलता है
और न ही आयाम।
हार जाता है खुद से
और टूट के रह जाता है
खुद अपने-आप में।
मन मसोसकर
अपने बढ़े हुये कदम
पीछे खींच लेता है और
फिर उन्हीं चहरदिवारी में
जा कर कैद हो जाता है
जहाँ से बाहर आकर
आज़ाद फ़िजाओं की
यात्रा करना चाहता था,
यात्रा करना तो दूर..
शायद उसे अब ये
आज़ाद फ़िजाओं ही
कैदखाना लगने लगी थी,
पागल कुत्ते की तरह
काटने लगती है..
इसलिए वो वापस अपनी
उसी दुनियाँ में लौट कर
खुद को आज़ाद समझता है
और फिर उसी पुरानी
दर्द की पीड़ा में
घुट घुट कर जीता है
घुट घुट कर मरता है
और ज़िन्दगी के मुहाने पर
रख देता है वक्त की मार।
कुछ दर्द की यातना,
और बना देता है मनुष्य को
एक काठ का पुतला।।
        ©अतुल कुमार यादव

Saturday, 17 February 2018

ग़ज़ल : पन्ना

यही साहिल यही कश्ती यही पतवार है पन्ना​,​​
​​​किताबों के समन्दर का यही मझधार है पन्ना​।​​

​​बुजुर्गों की दुआओं से बचे हैं हम बलाओं से,​​​
​​​विरासत में मिला हमको यही संसार है पन्ना​।​​

​सलामत ऐ खुदा रखना हमारी लेखनी को तुम
​हमारे गीत ग़ज़लों का यही सत्कार है पन्ना​।

लगा दे आग पानी में मचलती जिन्दगानी में,
जला दे घर किसी का तो यही बेकार है पन्ना।

बहुत आसान करना है किनारा अब गरीबों से,
बना अब मजहबों खातिर यही दीवार है पन्ना।

सिखा दे प्यार से रहना मिलाकर एक दूजे को,
कहूँगा मैं हमेशा फिर यही स्वीकार है पन्ना।।
                                 ©अतुल कुमार यादव

Wednesday, 17 January 2018

हाथ की चूड़ी

ख़नकती जब सुबह में है तुम्हारे हाथ की चूड़ी,
जगा देती हमें पल में  ख़नक से हाथ की चूड़ी।

चमक ऐसी जड़ी  इनमें  लगे  चन्दा सितारा है,
दिये की रौशनी लगती  कभी ये हाथ की चूड़ी।

बनाती  ख़ूबसूरत  हैं  बढ़ाती  हाथ  कि शोभा,
सुहागन हैं दिखाती अब तुम्हें ये हाथ की चूड़ी।

हरी नीली  गुलाबी  लाल  हाथों  पर सजी ऐसे,
ख़ुशी का रंग  हो  जैसे  तुम्हारे  हाथ  की चूड़ी।

कहीं सोना कहीं चाँदी कहीं पर काँच की दिखती,
अलग पहचान रखती हैं  तुम्हारे हाथ की चूड़ी।

बुरा होने को जब  होता  ये  पहले टूट जाती हैं,
करे आग़ाह  तुमको  ही  तुम्हारे हाथ  की चूड़ी।

जगाती जो रही अब तक सुनाकर ख़ुद ख़नक दिल की,
अतुल को भा गयी है अब उन्ही के हाथ की चूड़ी।।
                                       ©अतुल कुमार यादव