Tuesday, 17 July 2018

मौन खुद से त्याग कर

मौन खुद से त्याग कर, बैराग मन में साध कर,  जब
काँपते  हो  स्वर  हमारे  बोल  कर  मैं  क्या  करूंगा।

भाव   विह्वल   हो   रहे   संवेदनाएँ   छल   रही   है,
अनकही  है  बात  मन  की  कल्पनाएँ  पल  रही  है,
कल्पनाओं के जिगर  में  मैं  उतर कर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे  बोल कर मैं क्या करूंगा।

शुन्य  निर्जन  चीड़  वन  से  पार  लाना  है  तुम्हें  ही,
लक्ष्य  कितना  दूर  है  यह  भी  बताना  है  तुम्हें  ही,
प्रीत की सहमी ऋचाएँ आज पढ़ कर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे  बोल कर मैं क्या करूंगा।

एक कदम पर फूल है तो एक कदम पर शूल बिखरे,
शब्द कुछ अहसास बन के पास मन के याद निखरे,
चुम्बिनी अनुभूतियों में आज जल कर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे  बोल कर मैं क्या करूंगा।

नेह  के   अनुबंध   फीके   प्रेम  के   जंगल  निरेखो,
शुचि  पत्रों  में  कभी  जीवन-मरण  को तुम टटोलो,
पुण्य  पापों  में  दहा  हूं  और  दहकर क्या करूंगा?
जब काँपते हो स्वर हमारे बोल कर मैं क्या करूंगा।
                                          ©अतुल कुमार यादव

No comments:

Post a Comment