ज़िंदगी की धार में हम नाव बनकर चल रहे हैं,
छोर के किस ओर जाकर हम लगेंगे ये बता दो।
अनगिनत लहरें पड़ी हैं अनगिनत दुश्वारियां हैं,
अनगिनत है मोड़ इसमें अनगिनत तैयारियां हैं,
बेख़बर हैं साहिलों से बेख़बर है आधियों से,
हौसलों को साधने हम चल पड़े खुद्दारिओं से,
जिंदगी के इस भँवर में दूर सबसे हो रहे हैं,
छोर के किस ओर जाकर हम लगेंगे ये बता दो।
नाव अपनी डगमगाती क्युँ भला मझधार में है,
जब उजाला पास है तो क्युँ तिमिर संसार में है,
हम तिमिर को दूर करने का लिए संकल्प मन में,
सूर्य को चल खीच लाएँ जिंदगी के आचमन में,
पाँव बढ़ते पूछते हैं क्या सुपथ पर बढ़ रहे हैं,
छोर के किस ओर जाकर हम लगेंगे ये बता दो।
मैं अकेला एक राही दर बदर भटका किया हूं,
ज्योत जिसकी बुझ गई है प्रेम का मैं वो दिया हूँ,
धार में गर तुम फंसे तो तब तुम्हें एहसास होगा,
जीतना इस ज़िंदगी से है कठिन विश्वास होगा,
धूप बढ़ती जा रही है धार में हम जल रहे हैं,
छोर के किस ओर जाकर हम लगेंगे ये बता दो।
अजनबी थे जब मिले थे अजनबी फिर हो गए हैं,
ज़िंदगी के कुंभ में हम लग रहा है खो गए हैं,
पीर मन की तब मुखर हो गीत मन के लिख रही है,
लेखनी अतिरेक होकर तन सरीखा दिख रही है,
आह की इन सिसकियों में रास्ते गुम हो रहे हैं,
छोर के किस ओर जाकर हम लगेंगे ये बता दो।।
© अतुल कुमार यादव
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