चाँद अब तक नभ में बैठा लाल सूरज हो चला है,
दीप अपनी रौशनी भी इस जगत में खो चला है।।
रात में इक चाँदनी मन को हमारे भा रही थी,
रात की ही चाँदनी वो गीत मन का गा रही थी,
गीत में खोया हुआ मन रात को ही भूल बैठा,
भोर के आलोक में अब रूप चन्दा खो चला है,
चाँद अब तक नभ में बैठा लाल सूरज हो चला है।
गीत में कुछ वेदनाएँ भावनाएँ बह रही थी,
अनगढ़े सब बिम्ब लेकर आँख सच को कह रही थी,
वक्त की दहलीज़ पर कुछ घाव मन का रख दिया था,
अब वही उपमान जीवित दर्द मन में बो चला है,
चाँद अब तक नभ में बैठा लाल सूरज हो चला है।
चाँद के चेहरे की चमचम अब नदी भी खा गयी है,
लाल सूरज लालिमा लेकर सुबह खुद आ गयी है,
शीत इस मानस पटल पर वेदनाएँ खुद बिखेरी,
मौन सांकल आँसुओं के पीर को बस धो चला है,
चाँद अब तक नभ में बैठा लाल सूरज हो चला है।
कारवां इन आँसुओं का आँख में कब तक रुका है,
रक्त मानो देह में हिमखण्ड सा अब जम चुका है,
पीर की दुनिया बड़ी छल द्वेष के दम पर खड़ी है,
दम्भ भरता है ह्रदय जो अंत में खुद रो चला है,
चाँद अब तक नभ में बैठा लाल सूरज हो चला है।
©अतुल कुमार यादव
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