कल्पित मन में सपने लेकर हम सपनों में अब खो जाए,
तुम आधा हो मैं आधा हूँ चलो एक मिलकर हो जाए।
बहुत समय से मिले नहीं हैं मिलने की यह तत्परता है,
समय अभी तक रुका हुआ है पल पल मन आहे भरता है,
मेरे जीवन की सरिता में परिवर्तन की राह रही हो,
मेरे सपनों में मंजिल थी मंजिल की तुम चाह रही हो,
खुशियों के मन दीप जले हैं बुझकर जाने कब खो जाए,
तुम आधा हो मैं आधा हूँ चलो एक मिलकर हो जाए।
बैठे - बैठे ऊघ रहा हूँ मैं यादों की अमराई में,
कितने रिश्ते बिखर गए हैं इन रिश्तों की तुरपाई में,
पीड़ा के अहसास छिपे हैं बस सागर की गहराई में,
खुशियों के पैगाम भरे हैं इस जीवन की शहनाई में,
प्रेम अधूरा तुम बिन मेरा चलो प्रेम के गीत सुनाए,
तुम आधा हो मैं आधा हूँ चलो एक मिलकर हो जाए।
रात सुहानी है ख्वाबों की बस आकर हमें जगाना मत,
शीश धरे बैठो कंधे पर भोलापन तुम दिखलाना मत,
जीवन भर खुशियाँ पाने को कल फिर से उपवास रखूंगा,
फिर जीवन के इक-इक पल का जीवित हर अहसास लिखूंगा
जीवन में कल्पित सपने सब ना जाने ये कब खो जाएं,
तुम आधा हो मैं आधा हूँ चलो एक मिलकर हो जाए।
हाथ बाँध कर क्यों बैठी हो बोलो क्या क्या मजबूरी है,
साथ हमेशा चलो हमारे अब कैसी दिल में दूरी है,
निश्छल अपना प्रेम रहा है तुम जग को इतना बतला दो,
प्रेमभाव बनकर कविता में बस आकर इतना दिखला दो,
इक प्रतिबिंब बनो तुम मेरा दर्पण खंड - खंड हो जाए,
तुम आधा हो मैं आधा हूँ चलो एक मिलकर हो जाए।।
©अतुल कुमार यादव
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