जख़्म अपनों से मिला तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी,
दर्द जब दिल का बढ़ा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
रस्म मैनें सब निभाई थी मुहब्बत की मगर,
फ़ासला दिल का हुआ तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
झूठ की दहलीज पाकर इश्क़ खंजर हो गया,
रूह के अन्दर चुभा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
दोस्तों ने बात बदली याद उसकी आ गयी,
याद में जब खो गया तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
दर्द से बेशक़ अभी तक ज़िन्दगी अंजान है,
आँसुओं से तन भिगा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
ज़िन्दगी की राह काँटों से भरी लगती अतुल,
हाले' दिल अपना लिखा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
©अतुल कुमार यादव
दर्द जब दिल का बढ़ा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
फ़ासला दिल का हुआ तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
रूह के अन्दर चुभा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
याद में जब खो गया तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
आँसुओं से तन भिगा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
हाले' दिल अपना लिखा तो ख़ुद ग़ज़ल होने लगी।
©अतुल कुमार यादव
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