Monday, 17 February 2020

आवारा था आवारा हूँ।

मन  अपने  से  हारा  है  तो   मैं  अपनों  से   हारा  हूँ,
जग  की  नजरों  में  मैं  तो  आवारा  था  आवारा  हूँ।

सारी  उम्र   गुजारी   हमने   गाँव   गली  चौराहों  पर,
इक इक शब्द लिखा फिर हमने आँसू पीड़ा आहों पर,
उल्लासित  मन  कंपित सा तन आज दुखी हो बैठा है,
आँसू  अब  गंगाजल  होकर  अपनी  राहें  खो बैठा है,
इसमें  मेरा  दोष  नहीं  है   मैं   किस्मत  का  मारा  हूँ,
जग  की  नजरों  में  मैं  तो  आवारा  था  आवारा  हूँ।

दुनिया चाहे  जो  कुछ  सोचे  मैं  विचार  का  धागा हूँ,
अपनी  धुन  में  रहने  वाला  मैं  तो  एक  अभागा  हूँ,
नहीं  फर्क  पड़ता  है  मुझको  जग  के  ताने  बाने से,
नहीं  विकल  होता  हूँ  मैं  अब  अपने दोष गिनाने से,
आसमान  का  टूटा   मानो   मैं   तो  एक‌  सितारा  हूँ,
जग  की  नजरों  में  मैं  तो  आवारा  था  आवारा  हूँ।

नमक लगाना जख्मों पर तो इस दुनिया की आदत है,
मरहम रखना  जख्मों  पर तो  झूठी  एक  कहावत है,
पाकर भेद अनूठा  मन  में  एक अलग सी उलझन है,
ह्रदय  दिवाकर  सम  दीपों  के संबंधों  से  अनबन है,
छोड़ दिया उस जग को मैंने जिस जग का दुत्कारा हूँ,
जग  की  नजरों  में  मैं  तो  आवारा  था  आवारा  हूँ।

मचल  उठे  कुछ दर्द  नए अधरों  से  बाहर  आने को,
सूख  गए  आंखों  के  आंसू  मेरा  साथ  निभाने  को,
पीड़ाओं से हाथ मिला  कर  कदम बढ़ा बदलावों को,
खामोश निगाहें देख रही  हैं जीवन की आशाओं को,
हारा  नहीं  नहीं  मैं   हारा   मैं   जीवन  की‌  धारा  हूँ,
जग  की  नजरों  में  मैं  तो  आवारा  था  आवारा  हूँ।
                                          ©अतुल कुमार यादव

Friday, 17 January 2020

मेरी याद

ऐ सुन मेरी याद...!
कल तुमने ही कहा था छोड़ जाओगी हमें
तो गयी क्युँ नहीं?
मैंने तो सोच लिया था कि तुम चली गयी
और घर के कोने में बैठा-बैठा
तुम्हारी यादों से लिपटकर सिसक भर लिया था।

ऐ सुन मेरी याद...!
कल यादों के जखीरों में
तुम्हारे याद की मिट्टी कुछ गीली हो गयी थी,
कुछ आकृतियाँ उभर आयी थी।
उसी मिट्टी के लोथे पर लगा कि
तुमने कुछ अक्षर कुछ शब्द
कुछ कायाकल्प गढ़ें हैं।

ऐ सुन मेरी याद...!
मैनें बहुत कोशिश की उन विम्बों के प्रतिमान को
जानने समझने और साकार करने की
परन्तु वो सच न हो सके
जानती हो क्युँ? नहीं न?
अरे ! वो भी तुम्हारी तरह ही थे,
बेवड़े, निकम्मे, बेपरवाह, बेतरतीब
और तुम्हारी तरह ही बदल रहे थे पल पल।

तो सुन मेरी याद...!
तुम ऐसे ही आती रहना बदलती रहना।
तुम्हारे आने और जाने के बीच का बदलाव
हमें राहत देता है रास्ता दिखाता है
एक नयी चेतना नयी ऊर्जा का संचार करता है।

ऐ सुन मेरी याद...!
कल तलक मैं सोचता था
शायद तुम नहीं आओगी
पर आज तुम्हारे आने के बाद
हमें यकीन हो गया तुम्हारे अपनेपन पर,
तुम्हारे होने पर तुम्हारे अहसास पर
और तुम्हारी छुवन पर।

ऐ सुन मेरी याद...!
कहीं न कहीं मैं
अभी तक जिन्दा हूँ तुम्हारे अन्दर
या तुम जिन्दा हो हमारे अन्दर।
और जब भी अकेला बैठा मैं
यह सोचता हूँ तो लगता है कि जब भी मैं
तुम्हें महसूस करूँगा तो मेरे साथ हँसने बोलने
और ढेर सारी बातें करने तुम जरूर आओगी।

ऐ सुन मेरी याद...!
अब तो हमें लगता है कि बस तुम ही तुम हो
मेरे सफर का सच्चा साथी।

तो सुन मेरी याद!
बस ऐसी ही आती जाती रहना
अपने होने का बोध कराती रहना
ऐ सुन मेरी याद ! अपनी याद दिलाती रहना।
                                   ©अतुल कुमार यादव