Sunday, 17 November 2019

नागफनियाँ

तुम्हारे आने की आहट पाकर
मैंने गुलमोहर के बीज
केवड़े की कलमे
और कुछ हरसिंगार के बिरवे
अपने आँगन में लगाये थे।

नित नये सृजन करने वाली धरती में
न गुलमोहर के बीज अंकुरित हुए
न केवड़े की कलमे अन्खुआई
न हरसिंगार के बिरवे बड़े हुए।
बदले में आज हमारे भीतर
दुख के कुछ नये बिरवे उग आये हैं।

जिस चंपई रंग को मैं
तुम्हारे स्वागत में
सहेजना चाहता था,
जिस गुलदस्ते को मैं
तुम्हें सौंपना चाहता था
वो तुम्हारे न आने पर
ख़ुद ब ख़ुद बिखर गए हैं।

तुम आये तो नहीं लेकिन
आँगन में फलते फूलते नींबू की ख़ुशबू
आज भी तुम्हारे आने की उम्मीद लिए है।

और अब जब लौट रहा हूँ मैं
तुम्हारे स्मृतियों के भीतर से
अपने आप से संवाद करते हुए
तब तुम्हारे प्रतिक्षा में
मन के आँगन में कुछ
नागफनियाँ उग आयी हैं।

और अब वही नागफनियाँ
मेरे अन्दर पसरे सन्नाटे में
बे मौसम ही चुभ रही हैं।
       ©अतुल कुमार यादव