क्या कभी
उसकी सुधियों को चुन सकुँगा?
काश! अगर मैं दर्पण होता
तो पता है क्या करता?
पहले अपने आप को देखता।
जी भर कर निहारता
और फिर थोड़ा थोड़ा
अपने आप को लिखता।
कविता के बागानों से
चुन कर लाता
कुछ शब्द
कुछ अक्षर।
जिनके अर्थ
मोगरे जैसे
बालों की तरह होते,
वही मोगरे!
जो कविता के चुने शब्दों जैसे
खिल उठते हैं।
बादलों के शिलाखंड पर बैठकर
देखता अपने आप को
जहां मुझे देखकर
कोई पूछने वाला नहीं होता कि
मै अपने आप को
कविता में देख रहा हूँ,
या दर्पण में निहार रहा हूँ।
वहां न मेरी जाति पूछी जाती
न धर्म
और न ही मेरी उम्र।
क्युकी कविता का दर्पण का
अपना धर्म अपनी जाति
और अपनी खुद की उम्र है।
जानते हो?
और क्या क्या करता मै
नहीं न?
अरे! सिर्फ औे सिर्फ़ निहारता मै
इन अक्षर अक्षर से शब्द को
इन शब्द शब्द से वाक्य को
जो अपने आप में मुझको समेटे
इस रात के चांद को ही
भूल बैठें हैं।
जानते हो
दर्पण का कविता होना
या कविता का दर्पण होना
क्या होता है?
नहीं न?
अरे ये दोनों ही एक जैसे है,
जो खत्म करते है
मन के अन्दर छिपे काश को।
और दिखाते है हमें
हमारे सच का आईना..
अब कभी न कहूँगा
काश! मै दर्पण होता।।
©अतुल कुमार यादव
