Friday, 17 May 2019

घर अधूरा लग रहा है

घर  अधूरा  लग  रहा  है  भाव  मेरे  अनमने,
सूर्य  के  तुम  डूबते  ही घर चली आना प्रिये।

डगमगाती  नाव  मेरी  चल  रही  है  छोर  से,
बह न जाये ज़िन्दगी ये मन लहर को तोड़ के,
तुम सहारा  हो  हमारी  पास तुमको देखकर,
कसमसा केे रह गये  हैं कुछ अकेले सोचकर,
मुक्त बाहों में पड़े हैं कुछ अधर के सिलसिले,
सूर्य  के  तुम  डूबते ही  घर चली आना प्रिये।

अंग  आधा  हो   हमारी   हो   हमारी   देवता,
जग अभी तक आपकेे ही काँध पे तो है टिका,
देह  मेरी  मरुथली  है आपके  बिन  लग रही,
वक्त में जो नप गयी है  ज़िन्दगी तो सब सही,
चाहते हैं रात केे हम गाल पर कुछ लिख सके,
सूर्य  के  तुम  डूबते  ही  घर चली आना प्रिये।

मानता हूँ  ज़िन्दगी  की सीढ़ियाँ हैं अनगिनत,
आ गये नव द्विप में  हैं  मिल गयी है सल्तनत,
चाहतें  ही  मंज़िलोें  की  दूर  हमके कर गयी,
पल  पुराने  याद  आये आँख  मेरी  भर गयी,
दूर  होते  आपसे  ही  स्वर  हमारे  बिध  गये,
सूर्य  के  तुम  डूबते ही  घर चली आना प्रिये।

फासले  तो चाहते  हैं  फ़िर लिपटना प्यार से,
आँसुओं को पढ़  न पायेे आप हम स्वीकारते,
खिड़कियों पे आँख रक्खे वक्त हमसे खेलता,
प्राण भी अब  हाथ जोड़े कह रहा है  देवता!
लौट आओ द्वार तुम बिन हम अधूरे रह गये,
सूर्य  के  तुम  डूबते ही  घर चली आना प्रिये।
                                ©अतुल कुमार यादव